कॉर्पोरेट कंपनियों के भीतर का अनदेखा सच
बालको में कैसी है इस मुद्दे की स्थिति?
कोरबा (पब्लिक फोरम)। किसी भी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी की सफलता केवल उत्पादन, मुनाफे और नई परियोजनाओं से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि वह अपने कर्मचारियों के साथ कितना न्यायपूर्ण व्यवहार करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब मानव संसाधन (HR) विभाग निष्पक्षता छोड़कर दबाव, पक्षपात या मनमाने निर्णय लेने लगता है, तो उसका प्रभाव केवल कर्मचारियों पर तो पड़ता ही है, साथ ही पूरी कंपनी की साख, सरकारी संबंधों और भविष्य की परियोजनाओं तक पहुँच जाता है।
यदि किसी कंपनी में श्रम कानूनों की अनदेखी होती है, कर्मचारियों का उत्पीड़न होता है, नियम विरुद्ध कर्मचारियों का स्थानांतरण किया जाता है या बिना उचित प्रक्रिया के सेवा समाप्त की जाती है तो इसके दुष्परिणाम सबसे पहले कंपनी के External Affairs और Corporate Affairs विभाग को झेलने पड़ते हैं।

जब कर्मचारी न्याय की मांग लेकर श्रम विभाग, जिला प्रशासन, पुलिस या न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हैं, तब इन शिकायतों का सामना करने की जिम्मेदारी अक्सर External Affairs विभाग पर आ जाती है। वही अधिकारियों से संवाद करता है, कंपनी का पक्ष रखता है और बिगड़ते माहौल को संभालने की कोशिश करता है।
श्रम विवाद यदि मीडिया और सोशल मीडिया तक पहुँच जाए तो मामला केवल कर्मचारियों का नहीं रह जाता। कंपनी की सार्वजनिक छवि प्रभावित होती है, निवेशकों का भरोसा डगमगाता है और स्थानीय समुदाय में भी कंपनी के प्रति नकारात्मक धारणा बनती है। ऐसे समय में संकट प्रबंधन (Crisis Management) का पूरा दबाव External अफ़ेयर्स और अन्य विभागों पर आ जाता है।
औद्योगिक विशेषज्ञों का कहना है कि जिन कंपनियों को पर्यावरण, भूमि, खनन या अन्य सरकारी स्वीकृतियों की आवश्यकता होती है, उनके लिए खराब औद्योगिक संबंध गंभीर चुनौती बन सकते हैं। प्रशासन और स्थानीय समुदाय के साथ तनाव बढ़ने पर नई परियोजनाओं और विस्तार योजनाओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
जब कर्मचारियों, यूनियनों या स्थानीय संगठनों द्वारा धरना, प्रदर्शन और विरोध शुरू होता है, तब सबसे पहले सुरक्षा (Security) और External Affairs विभाग को मैदान में उतरना पड़ता है। विडंबना यह है कि जिन अधिकारियों ने विवादित निर्णय नहीं लिया, उन्हें ही उसके परिणामों से जूझना पड़ता है।
कॉर्पोरेट गवर्नेंस के जानकारों का कहना है कि यदि कोई अनुचित निर्णय HR विभाग द्वारा लिया जाता है, तो उसकी प्राथमिक जवाबदेही HR और संबंधित प्रबंधन की होती है। लेकिन उसके कारण उत्पन्न प्रशासनिक, सामाजिक और जनसंपर्क संबंधी संकट का बोझ अक्सर External Affairs को उठाना पड़ता है।

औद्योगिक संबंधों के जानकार मानते हैं कि एक स्वस्थ कॉर्पोरेट संस्कृति वही है जहाँ HR, External Affairs, Security, पीआर, लीगल और शीर्ष प्रबंधन के बीच पारदर्शिता, कानूनी अनुपालन और बेहतर समन्वय हो। HR की एक गलत नीति केवल कर्मचारियों का मनोबल नहीं तोड़ती, बल्कि कंपनी की प्रतिष्ठा, सरकारी संबंधों, सामाजिक स्वीकार्यता और दीर्घकालिक व्यावसायिक हितों को भी प्रभावित कर सकती है।
सवाल यही है – क्या अल्पकालिक लाभ या किसी एक पक्ष को खुश करने के लिए लिए गए निर्णय, कंपनी के दीर्घकालिक हितों से बड़े हो सकते हैं? यही प्रश्न आज कोरबा स्थित बालको वेदांता के उपक्रम भारत एल्यूमिनियम कंपनी में गंभीर चर्चा का विषय बनता जा रहा है।
इस मुद्दे को व्यापक परिप्रेक्ष्य में यदि कोरबा स्थित बालको वेदांता की मौजूदा स्थिति पर देखा जाए, तो उसके मानव संसाधन की कार्यप्रणाली कई गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
श्रमिक पक्ष का आरोप है कि प्रबंधन द्वारा एक विशेष यूनियन के पदाधिकारी के दबाव में कई कर्मचारियों के खिलाफ नियम विरुद्ध स्थानांतरण, कारण बताओ नोटिस और सेवा समाप्ति जैसी कार्रवाई की गई है जबकि उनके विरुद्ध कंपनी के किसी भी नियम कानून के उल्लंघन का कोई मामला नहीं है यहां पर सीधे HR ने यूनियन के अंदरूनी मामले में दखल देकर करवाई की है जो बालकों के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। वहीं कुछ श्रमिको का कहना है कि उन्होंने स्थायी प्रकृति के कार्य, श्रमिकों के नियमितीकरण, वेतन समझौते और श्रम कानूनों के अनुपालन जैसे और भी कई मुद्दे उठाए थे। उनका आरोप है कि इन मुद्दों को उठाने के बाद संबंधित श्रमिक प्रतिनिधियों को स्थानांतरण अथवा अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा।

इसी क्रम में बालको की घोषित भर्ती श्रेणियों, स्थानीय रोजगार नीति तथा स्थायी प्रकृति के कार्यों में संविदा श्रमिकों की नियुक्ति को लेकर भी श्रमिक पक्ष सवाल उठा रहा है। उनका कहना है कि कंपनी की घोषित नीतियों और लागू श्रम कानूनों के अनुरूप व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।
इन आरोपों की वास्तविकता का अंतिम निर्धारण संबंधित न्यायिक एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं से ही होगा। लेकिन BALCO के संदर्भ में इतना जरूर महत्वपूर्ण है कि लगातार सामने आ रहे श्रमिक विवादों की निष्पक्ष समीक्षा हो और यह देखा जाए कि कहीं किसी विभागीय निर्णय का अनावश्यक प्रभाव औद्योगिक संबंधों पर तो नहीं पड़ रहा।
क्योंकि किसी भी बड़े औद्योगिक संस्थान में कर्मचारी और प्रबंधन के बीच विश्वास केवल आदेशों से नहीं, बल्कि निष्पक्षता, संवाद और पारदर्शिता से बनता है।
बालको की इन घटनाओं को यदि अलग-अलग मामलों के बजाय एक व्यापक औद्योगिक परिदृश्य के रूप में देखा जाए तो सबसे बड़ा सवाल Human Resources (HR) विभाग की भूमिका और उसकी निर्णय प्रक्रिया पर उठता है।
किसी भी बड़े औद्योगिक संस्थान में HR का मूल उद्देश्य केवल कर्मचारियों पर प्रशासनिक नियंत्रण रखना नहीं, बल्कि प्रबंधन अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच संतुलन कायम करना होता है। HR वह विभाग है जिसे कर्मचारियों, यूनियनों, विभागीय प्रमुखों, External Affairs, Security और शीर्ष प्रबंधन के बीच समन्वय की भूमिका निभानी होती है। लेकिन यदि HR के निर्णय ही विवाद पैदा करने लगें, तो उसका असर केवल संबंधित कर्मचारी तक सीमित नहीं रहता। बल्किइस विभाग का फैसला, कई विभागों पर बोझ बन जाता है।
किसी कर्मचारी के स्थानांतरण, निलंबन, सेवा समाप्ति अथवा यूनियन से जुड़े विवाद का निर्णय यदि विवाद का रूप लेता है, तो उसके बाद उसका असर कई स्तरों पर दिखाई देता है।
External Affairs को प्रशासन और स्थानीय समुदाय के सवालों का सामना करना पड़ता है। Security को धरना, प्रदर्शन और विरोध की परिस्थितियों से निपटना पड़ता है। Legal विभाग को न्यायालय और श्रम विवादों का सामना करना पड़ता है। और अंततः शीर्ष प्रबंधन को कंपनी की प्रतिष्ठा तथा औद्योगिक संबंधों पर पड़ने वाले प्रभाव का जवाब मालिक को देना पड़ता है।

यानी किसी एक विभाग के गलत निर्णयों का बोझ पूरे संगठन पर पहुंच जाता है।
मुद्दा यह नहीं है कि HR अनुशासनात्मक कार्रवाई करे या ना करे। मुद्दा यह है कि हर कार्रवाई कितनी निष्पक्ष, पारदर्शी, नियम सम्मत और कितनी संतुलित प्रक्रिया के तहत की जा रही है।
एक मजबूत औद्योगिक संस्थान में HR वह विभाग होना चाहिए जो प्रबंधन, अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच पुल बने, दीवार नहीं।
यदि श्रमिक पक्ष के आरोप सही हैं और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई किसी व्यक्ति /पदाधिकारी विशेष, केवल यूनियन गतिविधियों या किसी विशेष पक्ष के विरोध के कारण हुई है, तो यह गंभीर चिंता का विषय होगा। वहीं यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ वास्तविक प्रशासनिक या अनुशासनात्मक कारण हैं, तो प्रबंधन को उन कारणों को स्पष्ट और पारदर्शी तरीके से सामने रखना चाहिए।
किसी भी HR अधिकारी की प्राथमिक जिम्मेदारी केवल अपनी नौकरी सुरक्षित रख मौज मस्ती नहीं हो सकती। व्यक्तिगत सुविधा या अल्पकालिक स्वार्थ के लिए ऐसे निर्णय लेना, जिनका बोझ बाद में External Affairs, Security, Legal और शीर्ष प्रबंधन को उठाना पड़े, किसी कंपनी के हित में नहीं होता देर सबेर परिस्थितियां बदलती है और पूरा भुगतान मय ब्याज चुकाना पड़ता है।
HR को सभी विभागों के साथ तालमेल बनाकर काम करना होगा। कर्मचारियों और यूनियनों से संवाद का रास्ता खुला रखना होगा और किसी भी विवाद को उस स्तर तक पहुंचने से पहले सुलझाने का प्रयास करना होगा जहां वह कंपनी के लिए सार्वजनिक संकट बन जाए।
क्योंकि HR केवल मानव संसाधन नहीं, कंपनी का संतुलन है!
यदि कर्मचारियों को लगता है कि उनकी बात सुनी नहीं जा रही, यूनियनों को लगता है कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है और विवाद बढ़ने के बाद External Affairs तथा Security को मैदान में उतरना पड़ रहा है, तो यह केवल श्रमिक विवाद नहीं रह जाता – यह संगठनात्मक समन्वय की समस्या बन जाता है।
बालको के मामले में मानव संसाधन से जुड़े लोगों का मानना है कि बालको को जरूरत इस बात की है कि HR अपने निर्णयों को पारदर्शिता, कानून, निष्पक्षता और संगठन के दीर्घकालिक हितों के आधार पर ले ना की किसी व्यक्ति विशेष के इशारे पर, क्योंकि HR का एक असंतुलित निर्णय किसी एक कर्मचारी को प्रभावित कर सकता है, लेकिन उसका असर पूरे कंपनी पर पड़ सकता है।
कुल मिला के बालको के विषय में अब देखना ये है कि HR तमाम विवादों का एक संतुलित हल निकाल कर कंपनी को एक बेहतर विकास की गति देगा या फिर येन केन प्रकारेण अपनी नौकरी पूरी कर इन विवादों को अगले HR के गले डाल देगा।





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