कोरबा (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ के कोरबा में वेदांता अधिग्रहित संयंत्र बालको के बहुचर्चित चिमनी हादसे को 15 साल बीत चुके हैं, लेकिन न्याय की राह में आज भी साजिशों का जाल बिछाया जा रहा है। बालकोनगर पुलिस ने टी.पी. नगर स्थित ‘होटल ग्रैंड गोविंदा’ में छापा मारकर इस मामले के मुख्य गवाह और आरोपी को एक ही कमरे में रंगे हाथ पकड़ा है। थाना प्रभारी युवराज तिवारी के नेतृत्व में हुई इस त्वरित कार्रवाई ने अदालत में गवाह के बयान पलटने की एक बड़ी साजिश को नाकाम कर दिया है। पुलिस ने मौके से मोबाइल फोन और डिजिटल साक्ष्य जब्त कर लिए हैं।
कमरा नंबर 202 में रची जा रही थी साजिश
बालकोनगर थाने की पुलिस को एक गुप्त सूचना मिली थी कि चिमनी हादसे का एक अहम गवाह सीधे आरोपी के संपर्क में है। सूचना मिलते ही बिना एक पल गंवाए, थाना प्रभारी युवराज तिवारी अपनी टीम के साथ होटल ग्रैंड गोविंदा पहुंचे।
जब पुलिस ने होटल के कमरा नंबर 202 का दरवाजा खुलवाया, तो भीतर का नजारा चौंकाने वाला था। जिस गवाह के बयान पर इस पूरे मुकदमे की नींव और 56 परिवारों का न्याय टिका है, वह गवाह आरोपी के साथ एक ही कमरे में मौजूद था। यह महज एक इत्तेफाक नहीं था, बल्कि एक बड़े औद्योगिक हत्याकांड को न्याय तक पहुंचने से रोकने की एक सोची-समझी साजिश थी।
डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित, पुलिस की त्वरित कार्रवाई
पुलिस की प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि आरोपी द्वारा मोबाइल फोन के जरिए गवाह को लगातार संदेश भेजे जा रहे थे। इन संदेशों में केस से जुड़ी संवेदनशील जानकारी साझा करने और अदालत में दिए जाने वाले बयान को प्रभावित करने के स्पष्ट संकेत मिले हैं।
इस मामले में पुलिस ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं:-
मोबाइल की जब्ती: पुलिस ने तत्काल आरोपी का मोबाइल फोन जब्त कर लिया है ताकि डिजिटल साक्ष्यों के साथ कोई छेड़छाड़ न हो सके।
पंचनामा और पूछताछ: मौके पर ही पंचनामा तैयार किया गया और होटल के कर्मचारियों से विस्तृत पूछताछ की गई।
सबूतों का संकलन: होटल के रजिस्टर, तस्वीरें और अन्य दस्तावेजी साक्ष्य पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिए हैं।
पुलिस सूत्रों का स्पष्ट कहना है कि यदि यह सूचना समय पर नहीं मिलती और तत्काल कार्रवाई नहीं होती, तो अदालत में पेश होने वाला गवाह अपना बयान बदल सकता था। इससे 15 साल से चल रहा यह पूरा मुकदमा पलट सकता था। अब गवाह को प्रभावित करने के इस आपराधिक प्रयास पर वैधानिक कार्रवाई की जा रही है।
15 साल का इंतजार और 56 परिवारों का कभी न मिटने वाला दर्द
23 सितंबर 2009 की वह मनहूस शाम, कोरबा के लोग आज तक नहीं भूले हैं। जो मजदूर रोज की तरह रोजी-रोटी कमाने घर से निकले थे, वे कभी लौटकर नहीं आए। बालको की निर्माणाधीन चिमनी ढहने से मलबे के नीचे दर्जनों जिंदगियां दफन हो गईं।
सरकारी फाइलों ने भले ही 40 मौतें मानीं, लेकिन हकीकत में 56 से ज्यादा परिवारों के घर का चिराग बुझ गया था। मुआवजे और नौकरी के वादे धीरे-धीरे फाइलों की धूल में दब गए। आज डेढ़ दशक बीत जाने के बाद भी उन परिवारों की आंखें न्याय के इंतजार में पथरा गई हैं। ऐसे में, जब न्याय की एक उम्मीद जगी, तो गवाह को खरीदने या डराने की यह कोशिश सामने आ गई। यह सिर्फ एक कानूनी अपराध नहीं है, बल्कि यह उन माताओं, विधवाओं और अनाथ हुए बच्चों के नासूर बन चुके जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।
आगे की राह: अदालत और व्यवस्था पर टिकी निगाहें
यह मामला अब केवल एक औद्योगिक लापरवाही या हादसे का मुकदमा नहीं रह गया है; यह सीधे तौर पर हमारी न्याय प्रक्रिया को बाधित करने और इंसाफ को खरीदने के प्रयास का एक बेहद गंभीर मामला बन चुका है।
पुलिस की सक्रियता ने फिलहाल एक बड़ी साजिश का पर्दाफाश कर दिया है। यह इस बात का प्रमाण है कि अगर व्यवस्था चाहे, तो सच्चाई को मलबे के नीचे हमेशा के लिए दफन होने से रोका जा सकता है। अब सभी साक्ष्य न्यायालय के समक्ष पेश किए जा रहे हैं और असली परीक्षा अदालत के कटघरे में होगी।
बालको चिमनी हादसे के पीड़ित परिवारों की आस आज भी इसी बात पर टिकी है कि कानून के हाथ उन रसूखदारों तक जरूर पहुंचेंगे, जो न्याय को अपनी मुट्ठी में कैद करना चाहते हैं। इंसाफ तभी मुकम्मल होगा, जब उस मलबे में दबी हर चीख को, 15 साल बाद ही सही, न्याय मिल सकेगा।





Recent Comments