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दूधीटांगर-पुटकापहाड़ सड़क विवाद: वन विभाग ने प्रकाशित खबर को बताया भ्रामक

5.16 करोड़ की सड़क-नाली निर्माण पर वन विभाग ने दी तथ्यात्मक सफाई

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कोरबा (पब्लिक फोरम)। दूधीटांगर से पुटकापहाड़ तक सड़क और नाली निर्माण को लेकर प्रकाशित समाचार पर वन विभाग कोरबा ने खंडन जारी किया है। विभाग का कहना है कि समाचार में सड़क के निर्माण वर्ष, क्षेत्र में निवासरत परिवारों, धार्मिक स्थल और सड़क की उपयोगिता से जुड़े तथ्यों को सही संदर्भ में प्रस्तुत नहीं किया गया। विभागीय जांच में सड़क की स्थिति सामान्य पाई गई, जबकि पहाड़ी हिस्से में अत्यधिक बारिश से सड़क को नुकसान होने की बात सामने आई है।

वन विभाग ने कराई मामले की जांच
दैनिक भास्कर रायपुर के 18 सितंबर 2026 के अंक में दूधीटांगर से पुटकापहाड़ सड़क तथा 5.16 करोड़ रुपये की लागत से सड़क-नाली निर्माण को लेकर समाचार प्रकाशित हुआ था। समाचार में क्षेत्र में 13 किलोमीटर तक कोई बसाहट नहीं होने सहित सड़क निर्माण और उसके क्षतिग्रस्त होने से जुड़े कई बिंदु उठाए गए थे।
इस पर वनमंडल अधिकारी कोरबा ने मामले की वास्तविक स्थिति की जांच कराई। डीएफओ के निर्देश पर उप वनमंडलाधिकारी द्वारा प्रस्तुत जांच प्रतिवेदन में समाचार में उल्लेखित कुछ तथ्यों को वास्तविक स्थिति से अलग बताया गया है।

सड़क वर्ष 2022 में पूरी हुई थी
वन विभाग के जांच प्रतिवेदन के अनुसार संबंधित सड़क का निर्माण वर्ष 2021-22 में स्वीकृत हुआ था और निर्माण कार्य अप्रैल 2022 में पूरा किया जा चुका है। विभाग का कहना है कि निर्माण पूरा हुए लगभग साढ़े चार वर्ष बीत चुके हैं।
इस आधार पर वन विभाग ने हाल में सड़क बनाए जाने के रूप में समाचार में प्रस्तुत किए गए तथ्य पर आपत्ति जताई है।

भारी बारिश से पहाड़ी हिस्से को नुकसान
सड़क की कुल लंबाई लगभग 12 किलोमीटर बताई गई है। इसमें करीब 100 से 150 मीटर हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरता है। विभागीय प्रतिवेदन के अनुसार इस हिस्से में पहाड़ी से तेज गति से आने वाले वर्षाजल के दबाव के कारण सड़क को सामान्य से अधिक नुकसान पहुंचा।
वन विभाग के अनुसार 18 सितंबर 2026 तक कोरबा तहसील में इस वर्षा ऋतु के दौरान 119.8 प्रतिशत वर्षा दर्ज की गई है। विभाग ने क्षतिग्रस्त हिस्से की मरम्मत बारिश समाप्त होने के बाद कराने के निर्देश दिए हैं।

‘13 किलोमीटर तक कोई बसाहट नहीं’ पर भी आपत्ति
वन विभाग ने समाचार में 13 किलोमीटर तक किसी बसाहट के नहीं होने के उल्लेख को भी वास्तविक स्थिति के अनुरूप नहीं बताया है।
जांच प्रतिवेदन के अनुसार मार्ग के क्षेत्र में मैगजीन नामक स्थान पर चार पहाड़ी कोरवा परिवार निवास करते हैं। इसके अलावा सड़क के अंतिम छोर पर राम कचहरी मंदिर स्थित है। विभाग के अनुसार यह मंदिर पहाड़ी कोरवा और अन्य विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों की आस्था से जुड़ा है।

यहां वर्ष में तीन बार पूजा-अर्चना होती है और आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। ऐसे में विभाग ने सड़क को केवल निर्जन क्षेत्र में बनी सड़क के रूप में देखे जाने पर भी सवाल उठाया है।

वन सुरक्षा और ग्रामीण उपयोगिता का भी हवाला
वन विभाग ने बताया कि दूधीटांगर और पुटकापहाड़ क्षेत्र अति संवेदनशील वन क्षेत्र हैं। गर्मी के मौसम में जंगलों को आग से बचाने और जैव विविधता की सुरक्षा के लिए वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी लगातार क्षेत्र का भ्रमण करते हैं।
विभाग के अनुसार यह मार्ग आसपास के ग्रामीणों के लिए निस्तारी और लघु वनोपज संग्रहण के लिहाज से भी उपयोगी है। इसलिए सड़क की उपयोगिता केवल आबादी तक आवागमन के आधार पर तय नहीं की जा सकती।

पूर्व खनन क्षेत्र के पुनर्वनीकरण में भी उपयोगी
वन विभाग ने सड़क की एक अन्य उपयोगिता का उल्लेख करते हुए कहा है कि पुटकापहाड़ में पूर्व में हुए खनन संचालन से प्रभावित क्षेत्र के पुनर्वनीकरण में भी इस मार्ग की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी।
इसका अर्थ यह है कि विभाग सड़क को वन प्रबंधन, ग्रामीण उपयोग और खनन प्रभावित क्षेत्र के पुनर्वनीकरण से जुड़े कार्यों के लिए उपयोगी मानता है।

वनमंडल कोरबा ने अपने खंडन में कहा है कि प्रकाशित समाचार में सड़क के निर्माण वर्ष, क्षेत्र में रहने वाले परिवारों, धार्मिक स्थल और मार्ग की उपयोगिता से संबंधित तथ्यों को समग्र रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया।
विभाग ने समाचार में दिए गए तथ्यों को विभागीय जांच प्रतिवेदन में सामने आई स्थिति के संदर्भ में देखने की बात कही है और प्रकाशित खबर को “तथ्यहीन और भ्रामक” बताया है।

दूधीटांगर-पुटकापहाड़ सड़क को लेकर सामने आए विवाद में एक ओर प्रकाशित समाचार में सड़क निर्माण और उसके उपयोग को लेकर सवाल उठाए गए, वहीं वन विभाग ने जांच के आधार पर उन दावों पर आपत्ति दर्ज की है। ऐसे मामलों में निर्माण की लागत, स्वीकृति और पूर्णता की तारीख, सड़क की वास्तविक उपयोगिता तथा स्थानीय निवासियों से जुड़े तथ्यों को आधिकारिक अभिलेखों और स्वतंत्र स्थानीय पड़ताल के साथ देखना जरूरी है। इससे किसी भी विकास कार्य की वास्तविक जरूरत और उसके सार्वजनिक महत्व का अधिक स्पष्ट आकलन किया जा सकेगा।

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