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बैतूल की भाजपा सांसद ज्योति धुर्वे का गोंड जनजाति प्रमाण पत्र निरस्त: लगा बड़ा झटका, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बड़ी कार्रवाई

भोपाल (पब्लिक फोरम)। मध्य प्रदेश के बैतूल संसदीय क्षेत्र से भाजपा सांसद ज्योति धुर्वे को जाति विवाद के मामले में बड़ा झटका लगा है। भोपाल में राज्य की हाई-पावर छानबीन समिति (High-Power Scrutiny Committee) ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए सांसद धुर्वे के गोंड जनजाति प्रमाण पत्र को निरस्त करने के अपने पिछले फैसले को यथावत रखा है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश पर हुई इस उच्च स्तरीय जांच के बाद सांसद की पुनर्विचार याचिका (Review Petition) को खारिज कर दिया गया है, क्योंकि वे समिति के समक्ष अपने पिता के पक्ष से जुड़े पुख्ता आदिवासी साक्ष्य पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहीं।

यह हाई-प्रोफाइल मामला पिछले दस सालों से मध्य प्रदेश की राजनीति में गरमाया हुआ था। ज्योति धुर्वे अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe – ST) के लिए आरक्षित बैतूल सीट से दूसरी बार संसद सदस्य चुनी गई हैं। हालांकि इस ताजा फैसले की अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन समिति के इस कड़े रुख से राजनीतिक गलियारों और विशेषकर आदिवासी समुदाय के भीतर एक नई बहस छिड़ गई है।
राज्य में राजनीतिक नेतृत्व के बदलते ही इस जाति प्रमाण पत्र का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया था। तत्कालीन कांग्रेस सरकार के आते ही इस संवेदनशील मामले की फाइलें दोबारा खोली गईं। सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने तत्कालीन मुख्य सचिव एस.आर. मोहंती से इस पूरे विवाद पर विस्तृत जानकारी तलब की थी।

इसके बाद मामले की गहराई से जांच के लिए दो विशेष प्रशासनिक टीमें गठित की गईं, जिन्होंने रायपुर, बैतूल और बालाघाट का दौरा कर जमीनी दस्तावेजों को खंगाला।
जांच टीमों की पड़ताल और समिति की लंबी सुनवाई के बाद जो तथ्य सामने आए, वे सांसद के दावों के विपरीत थे। समिति के निष्कर्षों के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
🔹 वंशावली का अभाव: सांसद ज्योति धुर्वे द्वारा प्रस्तुत किए गए तमाम साक्ष्य उनके पिता के परिवार और पैतृक वंशावली के अनुरूप नहीं पाए गए।
🔹 केवल मातृ पक्ष का सहारा: सांसद ने अपनी जाति को सिद्ध करने के लिए जितने भी प्रमाण पत्र और रिकॉर्ड पेश किए, वे सभी केवल उनके मातृ पक्ष (Maternal Side) से संबंधित थे।
🔹 संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन: भारतीय नागरिकता और आरक्षण नियमों के तहत जनजातीय दर्जे की वैधता के लिए पैतृक यानी पिता के वंश का प्रमाण अनिवार्य होता है, जिसका इस मामले में पूरी तरह अभाव दिखा।

“आरक्षित सीटों पर गैर-आदिवासियों का काबिज होना हमारे संवैधानिक अधिकारों पर सीधा डाका है। इस फैसले से बैतूल के लाखों मूल गोंड आदिवासियों को न्याय की उम्मीद दिखी है। सालों से हमारे हक की आवाज दबाई जा रही थी।”
— रामसिंह टेकाम, स्थानीय आदिवासी समाज प्रतिनिधि, बैतूल

इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ हो गया है कि नौकरशाही और न्यायिक व्यवस्था अब लोक प्रतिनिधित्व के मामलों में किसी भी प्रकार की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है। छानबीन समिति के इस कड़े रुख ने स्पष्ट संदेश दिया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को भी जवाबदेही के कड़े दायरे से गुजरना होगा।

इस ऐतिहासिक निर्णय का दूरगामी प्रभाव केवल बैतूल की राजनीति पर ही नहीं, बल्कि देश भर में फर्जी प्रमाण पत्रों के सहारे अनुसूचित सीटों का लाभ उठाने की प्रवृत्ति पर पड़ेगा। यह फैसला जमीनी स्तर पर रहने वाले उस आम आदिवासी परिवार को सुरक्षा की गारंटी देता है, जिसका हक अक्सर रसूखदार लोग छीन लेते हैं। अब देखना यह होगा कि इस फैसले के बाद सांसद ज्योति धुर्वे का अगला कानूनी कदम क्या होता है और संसद में उनके प्रतिनिधित्व का भविष्य क्या मोड़ लेता है।

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