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विश्व पर्यावरण दिवस पर पामगढ़ में सीड बॉल निर्माण कार्यशाला: बच्चों ने बनाए 500 सीड बॉल, ट्रेन से फेंकने का लिया संकल्प


प्रकृति शिक्षण विज्ञान यात्रा व यूथ एंड इको क्लब का संयुक्त आयोजन; इमली, नीम, जामुन के बीजों से तैयार हुए सीड बॉल

खरसिया(पब्लिक फोरम)। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आज प्राथमिक शाला पामगढ़ में सीड बॉल निर्माण कार्यशाला का आयोजन किया गया। प्रकृति शिक्षण विज्ञान यात्रा, यूथ एंड इको क्लब के संयुक्त तत्वावधान में हुए इस कार्यक्रम में प्राथमिक शाला, माध्यमिक शाला तथा हाई स्कूल पामगढ़ के बच्चों, पालकों और शिक्षकों ने मिलकर लगभग 500 सीड बॉल तैयार किए।

बच्चों में दिखा गजब का उत्साह

कार्यक्रम के लिए बच्चों ने पहले से ही इमली, करंज, नीम, जामुन और लीची के बीज इकट्ठा कर रखे थे। बच्चों ने बड़े उत्साह से सीड बॉल का निर्माण किया। कुछ बच्चों ने कहा, जब हम जगन्नाथ पुरी या अन्य जगह यात्रा पर जाएंगे तो ये सीड बॉल साथ ले जाएंगे और ट्रेन से बाहर फेंक देंगे ताकि दूर-दराज में भी पेड़ उग सकें। बच्चों के लिए यह एक मजेदार और नया प्रयोग रहा।

अधिकारियों ने समझाया महत्व

इस अवसर पर खरसिया बीआरसी प्रदीप साहू एवं हाई स्कूल पामगढ़ के प्राचार्य हरिशंकर पटेल ने बच्चों को सीड बॉल और पर्यावरण संरक्षण का महत्व बताया। बच्चों ने इसे आत्मसात करते हुए भविष्य में सक्रिय भागीदारी का संकल्प लिया। कार्यक्रम में प्रधान पाठक भुनेश्वरी मंथन, एसएमसी अध्यक्ष चंद्रकांत पटेल सहित तीनों स्कूलों के पालकगण व शिक्षक मौजूद रहे और सभी ने मिलकर सीड बॉल बनाए। बढ़ती गर्मी और ग्लोबल वार्मिंग के दौर में प्रकृति में संतुलन बनाए रखने के लिए वृक्षारोपण जरूरी है। सीड बॉल इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह पहल बच्चों में प्रकृति प्रेम, पारिस्थितिकी की समझ और ग्लोबल वार्मिंग के नुकसान के प्रति जागरूकता बढ़ाती है।

पूरे छत्तीसगढ़ में चल रहा अभियान

प्रकृति शिक्षण विज्ञान यात्रा की टीम द्वारा संपूर्ण छत्तीसगढ़, विशेषकर जगदलपुर, कांकेर आदि जगहों पर विशाल सीड बॉल कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है। इसी कड़ी में पामगढ़ में यह आयोजन हुआ।

जानें क्या है सीड बॉल?

सीड बॉल बनाने के लिए मिट्टी और खाद को आटे की तरह गूंथकर गोले बनाए जाते हैं। गोले के बीच में बीज डालकर छांव में सुखा दिया जाता है। बारिश में इन सूखे बॉल्स को दूर-दराज के इलाकों में फेंक दिया जाता है। बारिश का पानी पाकर बीज अंकुरित हो जाते हैं और पेड़ बन जाते हैं। इससे दुर्गम स्थानों पर भी आसानी से वृक्षारोपण हो जाता है।

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