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RCWF ने SECL और ठेकेदारों पर श्रम कानून उल्लंघन के आरोप लगाए: खदानों में ठेका श्रमिकों का शोषण, श्रम आयुक्त से शिकायत

नई दिल्ली/बिलासपुर/कोरबा (पब्लिक फोरम)। राष्ट्रीय कालरी वर्कर्स फेडरेशन (RCWF) ने कोल इंडिया लिमिटेड की अनुषंगी कंपनी साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) तथा उसके अधीन कार्यरत कई निजी ठेकेदारों के खिलाफ मुख्य श्रम आयुक्त (केंद्रीय) के समक्ष विस्तृत शिकायत प्रस्तुत की है। फेडरेशन का आरोप है कि SECL की भूमिगत और खुली खदानों में बड़ी संख्या में ठेका श्रमिकों को ऐसे कार्यों में लगाया जा रहा है, जिन्हें कानून के अनुसार संस्थान की मुख्य गतिविधियां माना जाता है।

कोर गतिविधियों में ठेका श्रमिकों की तैनाती का आरोप
RCWF का कहना है कि व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा संहिता (OSHW Code) 2020 की धारा 57 के तहत किसी प्रतिष्ठान की मुख्य गतिविधियों में ठेका श्रमिकों की नियुक्ति पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद कोयला काटने, कोयला उत्पादन, लोडिंग, छत को सहारा देने (रूफ सपोर्ट) तथा भारी मशीनों के संचालन जैसे कार्यों में ठेका श्रमिकों का व्यापक उपयोग किया जा रहा है।

फेडरेशन का दावा है कि ये कार्य खदान संचालन के मूल और स्थायी हिस्से हैं, इसलिए इनमें ठेका श्रमिकों की तैनाती श्रम कानूनों की भावना के विपरीत है।

लंबे अनुबंधों पर उठाए सवाल
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कई निजी कंपनियों को 6 वर्ष से लेकर 30 वर्ष तक की अवधि के अनुबंध दिए गए हैं। इनमें टेक्नो ब्लास्ट माइनिंग, जॉय माइनिंग चेन्नई, राधा इंजीनियरिंग वर्क्स (CREW), सिनचैती तथा नीलकंठ इन्फ्रा जैसी कंपनियों का उल्लेख किया गया है।

फेडरेशन का तर्क है कि इतने लंबे समय तक चलने वाले अनुबंध यह संकेत देते हैं कि संबंधित कार्य स्थायी प्रकृति के हैं। ऐसे में उन्हें ठेका व्यवस्था के माध्यम से संचालित करना कानून की मंशा से बचने का प्रयास माना जा सकता है।

नियुक्ति पत्र और मजदूरी को लेकर शिकायत
RCWF ने आरोप लगाया है कि हजारों ठेका श्रमिकों को नियुक्ति पत्र तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं, जिससे उनका रोजगार असुरक्षित बना हुआ है। शिकायत में OSHW Code की धारा 6 के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।

इसके साथ ही फेडरेशन ने यह भी कहा है कि समान प्रकृति का कार्य करने के बावजूद ठेका श्रमिकों को नियमित कर्मचारियों की तुलना में कम मजदूरी दी जा रही है। इसे मजदूरी संहिता 2019 तथा समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत के विपरीत बताया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
RCWF के नेता भागवत प्रसाद दुबे ने सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित ‘स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) बनाम नेशनल यूनियन वाटरफ्रंट वर्कर्स’ (2001) मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि मुख्य गतिविधियों में कानून का उल्लंघन करते हुए ठेका श्रमिक लगाए जाते हैं, तो ऐसे अनुबंधों की वैधता पर प्रश्न खड़े होते हैं।

फेडरेशन ने मांग की है कि प्रभावित श्रमिकों को उनकी प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से नियमित कर्मचारी का दर्जा दिया जाए तथा उन्हें वेतन संरक्षण, वरिष्ठता, भविष्य निधि (PF), ग्रेच्युटी और चिकित्सा सुविधाओं सहित सभी वैधानिक लाभ उपलब्ध कराए जाएं।

जांच और कार्रवाई की मांग
शिकायत में SECL की खदानों में चल रही ठेका श्रम व्यवस्था की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई है। साथ ही OSHW Code की धारा 104 के तहत दोषी पाए जाने पर संबंधित प्रबंधन और ठेकेदारों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की भी मांग उठाई गई है।

फेडरेशन ने मुख्य गतिविधियों से जुड़े वर्तमान ठेकों के नवीनीकरण और नए टेंडरों पर रोक लगाने की मांग भी की है। शिकायत की प्रतियां केंद्रीय श्रम सचिव, कोल इंडिया लिमिटेड के अध्यक्ष, SECL के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक, क्षेत्रीय श्रम आयुक्त बिलासपुर तथा महानिदेशक खान सुरक्षा (DGMS) धनबाद को भी भेजी गई हैं।

श्रमिकों के भविष्य से जुड़ा मामला
कोयला उद्योग में ठेका श्रमिकों की भूमिका लगातार बढ़ती रही है। ऐसे में रोजगार सुरक्षा, मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल की सुरक्षा से जुड़े प्रश्न केवल कानूनी बहस तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हजारों श्रमिक परिवारों की आजीविका से भी जुड़े हुए हैं। यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि होती है, तो इसका असर न केवल SECL की श्रम व्यवस्था पर बल्कि पूरे कोयला क्षेत्र में ठेका श्रम संबंधी नीतियों पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, इस संबंध में SECL प्रबंधन की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। प्रबंधन का पक्ष सामने आने के बाद मामले की स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।

SECL की खदानों में ठेका श्रमिकों को लेकर उठे ये सवाल केवल एक कंपनी या कुछ अनुबंधों तक सीमित नहीं हैं। यह मामला देश के खनन क्षेत्र में श्रम कानूनों के पालन, रोजगार सुरक्षा और श्रमिक अधिकारों की वास्तविक स्थिति पर भी ध्यान आकर्षित करता है। अब निगाहें श्रम विभाग और संबंधित एजेंसियों की कार्रवाई पर हैं, जिनकी जांच से यह स्पष्ट होगा कि शिकायत में लगाए गए आरोप कितने सही हैं और श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।

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