10 लाख प्रजातियाँ खतरे में, धरती की जैविक संपदा बचाने के लिए बचे सिर्फ चार साल
प्रकृति की पुकार अनसुनी रही, तो इंसान भी नहीं बचेगा – संयुक्त राष्ट्र का संदेश
आज, 22 मई को पूरी दुनिया “अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (IDB)” मना रही है। संयुक्त राष्ट्र ने यह दिन इसलिए तय किया है ताकि हम – आप, हम और हमारी सरकारें – एक पल रुककर सोचें कि हम इस धरती को अपनी अगली पीढ़ी के लिए कैसा छोड़ने जा रहे हैं। इस वर्ष की थीम है – “वैश्विक प्रभाव के लिए स्थानीय स्तर पर कार्य करना।” यह थीम सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है।
जैव विविधता – जीवन की जड़ें
जब कोई किसान अपने खेत में बीज बोता है, जब कोई आदिवासी मां जंगल से जड़ी-बूटी लाकर बीमार बच्चे का इलाज करती है, जब कोई मछुआरा समुद्र में जाल डालता है – इन सबके पीछे एक अदृश्य शक्ति काम करती है। उसका नाम है “जैव विविधता”।
पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव, प्रजातियों के भीतर का आनुवंशिक अंतर और विविध पारिस्थितिक तंत्र – यही सब मिलकर धरती पर जीवन को संभव बनाते हैं। यह महज एक वैज्ञानिक शब्द नहीं है, यह हमारी थाली का अनाज है, हमारे घर की दवाई है, हमारे बच्चों की साँस है।
कुछ तथ्य जो हिला देते हैं –
– मछली लगभग “3 अरब लोगों” के लिए 20% पशु प्रोटीन की आपूर्ति करती है।
– पौधे मानव आहार में “80% से अधिक” का योगदान देते हैं।
– ग्रामीण विकासशील क्षेत्रों में “80% लोग” पारंपरिक वनस्पति-आधारित दवाओं पर निर्भर हैं।
लेकिन आज यही जैव विविधता मानवीय लालच और लापरवाही के कारण “अभूतपूर्व दर से घट रही है।”
संकट कितना गहरा है?
आँकड़े सुनकर मन भारी हो जाता है –
– धरती के “तीन-चौथाई स्थलीय पर्यावरण” और “66% समुद्री पर्यावरण” को मनुष्यों ने बुरी तरह बदल दिया है।
– “10 लाख” से अधिक पशु और पौधों की प्रजातियाँ अब विलुप्त होने के कगार पर खड़ी हैं।
– वर्तमान में केवल “17% भूमि” और मात्र “8% समुद्री क्षेत्र” ही संरक्षित हैं।
सोचिए – जब जंगल कटते हैं, तो केवल पेड़ नहीं गिरते। उस जंगल पर जीने वाले आदिवासी परिवारों की रोज़ी-रोटी भी गिरती है। जब नदियां प्रदूषित होती हैं, तो केवल मछलियाँ नहीं मरतीं – मछुआरों के घर के चूल्हे भी बुझते हैं।
कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ढांचा – उम्मीद की किरण
दिसंबर 2022 में दुनिया के देशों ने मिलकर “कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचा” अपनाया। इसमें 2030 तक 23 लक्ष्य और 2050 तक चार वैश्विक उद्देश्य तय किए गए हैं। प्रमुख संकल्प इस प्रकार हैं –
– 30% खराब हो चुके पारिस्थितिक तंत्रों को बहाल करना।
– 30% भूमि, जल और समुद्रों का संरक्षण करना।
– आक्रामक विदेशी प्रजातियों को “50%” तक घटाना।
– जैव विविधता के लिए 2030 तक “प्रतिवर्ष 200 अरब डॉलर” जुटाना।
यह ढांचा यह भी स्वीकार करता है कि जैव विविधता का नुकसान सिर्फ पर्यावरण का संकट नहीं — यह “खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और कोरोना जैसी पशुजन्य महामारियों” का भी कारण बनता है।
2030 की घड़ी टिक-टिक कर रही है
हम 2026 में खड़े हैं। 2030 के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को पाने के लिए अब “केवल चार साल” बचे हैं। समय हाथ से फिसलता जा रहा है। इस वर्ष की थीम “स्थानीय स्तर पर कार्य” का संदेश यही है कि बदलाव की शुरुआत दिल्ली, जिनेवा या न्यूयॉर्क से नहीं – आपके गाँव, आपके मोहल्ले, आपकी नदी, आपके जंगल से – होगी।
छत्तीसगढ़ के कोरबा जैसे औद्योगिक शहरों में भी यह सवाल उठना चाहिए – क्या विकास की अंधी दौड़ में हमने अपनी हसदेव नदी को, अपने जंगलों को, अपनी मिट्टी की जैव विविधता को कुछ ज़्यादा ही महंगा चुकाकर खरीदा है?
अंत में – प्रकृति का कर्ज़
“जब जैव विविधता को नुकसान होता है, तो मानवता को भी नुकसान होता है।”
यह महज एक वाक्य नहीं, यह एक सत्य है जिसे हम रोज़ अनुभव करते हैं – फिर भी अनदेखा करते हैं। प्रकृति के साथ संतुलन बहाल करना अब कोई विकल्प नहीं रहा। यह हमारी बाध्यता है, हमारी ज़िम्मेदारी है – आने वाली पीढ़ियों के प्रति, और इस धरती के प्रति भी, जिसने हमें सब कुछ दिया है।
– अखिलेश एडगर





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