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मौत का ‘सौदा’ 30 लाख में! रायपुर में 3 सफाई कर्मियों की जान गई, लेकिन ‘सिस्टम’ ने रसूखदार अस्पताल को बचा लिया

“सफाईकर्मियों की मौत पर नरम पड़े राष्ट्रीय आयोग के सुर, एफआईआर से अस्पताल का नाम ही गायब”

रायपुर (पब्लिक फोरम)। किसी भी सभ्य समाज में इंसान की जान से कीमती कुछ नहीं होता, लेकिन रायपुर में तीन सफाईकर्मियों की मौत ने यह साबित कर दिया है कि हमारे सिस्टम में गरीबों की जान की कीमत अब 30-30 लाख रुपये तय कर दी गई है। तीन जिंदगियां सीवर टैंक के अंधेरे में घुटकर खत्म हो गईं, लेकिन रसूखदार अस्पताल प्रबंधन के सामने पूरा का पूरा प्रशासन और व्यवस्था ‘मौन’ हो गई है।

सबसे बड़ा सवाल जो चीख-चीख कर जवाब मांग रहा है- आखिर सफाईकर्मियों को उस जानलेवा टैंक के अंदर क्यों उतारा गया? लेकिन, ऐसा लगता है कि इस सवाल को हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

आयोग का दौरा: सख्त तेवर जो अस्पताल जाते ही नर्म पड़ गए
घटना के बाद राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के उपाध्यक्ष हरदीप सिंह गिल रायपुर पहुंचे। जब वे मृतकों के रोते-बिलखते परिजनों से मिले, तो उनके तेवर सख्त थे। उन्होंने कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिलाया। लोगों को लगा कि अब शायद न्याय होगा। लेकिन, इसके बाद गिल अस्पताल का निरीक्षण करने पहुंचे। बंद कमरों में प्रबंधन से क्या बात हुई, यह तो कोई नहीं जानता, लेकिन बाहर आते ही उनके सुर बदल चुके थे। गैस रिसाव और सुरक्षा उपकरणों पर उन्होंने कुछ सवाल किए, प्रबंधन के जवाबों से वे ‘संतुष्ट’ भी हो गए। मैनुअल स्कैवेंजिंग (हाथ से मैला साफ करने) पर सख्ती की कुछ रटी-रटाई बातें दोहराईं, मृतकों के लिए दो मिनट का मौन रखा और चलते बने। कोई ठोस एक्शन नहीं, सिर्फ खोखली चेतावनी।

सरकार की पर्ची से अस्पताल का नाम ‘गायब’
इस पूरे मामले में सरकार और प्रशासन का रवैया भी कम हैरान करने वाला नहीं है। घटना के बाद प्रशासन ने एक बैठक की और प्रेस विज्ञप्ति जारी की। रसूख का आलम यह था कि इस सरकारी विज्ञप्ति में उस अस्पताल (रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल) का नाम तक लिखने की हिम्मत नहीं दिखाई गई। उसे सिर्फ ‘एक निजी अस्पताल’ कहकर मामले की गंभीरता को कम करने की कोशिश की गई।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की सरेआम धज्जियां
साल 2013 में ही सुप्रीम कोर्ट ने ‘मैनुअल स्कैवेंजिंग’ पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। इसके तहत किसी भी इंसान को सीवर या टैंक में उतारना एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है। नियम स्पष्ट है कि ऐसा करने वालों को तुरंत गिरफ्तार किया जाना चाहिए। लेकिन विडंबना देखिए, इतनी बड़ी घटना के बावजूद कार्रवाई के नाम पर प्रशासन का रवैया अस्पताल प्रबंधन के प्रति बेहद नर्म बना हुआ है।

30 लाख रुपये और ‘शॉर्ट आउट’ होता मामला
न्याय की आवाज को मुआवजे के शोर में दबाने की पूरी कोशिश हो रही है। अस्पताल प्रबंधन ने पैसे देने का आश्वासन दिया और प्रशासन का पूरा फोकस भी सिर्फ ‘राहत’ पर ही दिखा। तीनों मृतकों के परिजनों को 30-30 लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा कर दी गई है। ऐसा लग रहा है जैसे सिस्टम ने मान लिया हो कि गलती की कीमत चुका दी गई है और अब मामला ‘शॉर्ट आउट’ (खत्म) हो गया है।

बंद कमरों की बैठकों में बड़े-बड़े निर्देश
औपचारिकता निभाने के लिए रेडक्रॉस सभाकक्ष में एक लंबी बैठक जरूर हुई। इसमें गिल ने सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का जिक्र किया और उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई की (सिर्फ) चेतावनी दी। इसके अलावा पीपीई किट अनिवार्य करने, हर 6 महीने में मेडिकल जांच, रात में सफाई कार्य रोकने, और न्यूनतम वेतन लागू करने जैसे बड़े-बड़े निर्देश दिए गए। पुलिस को एफआईआर में एट्रोसिटी एक्ट जोड़ने और बेघर परिवारों को पीएम आवास देने के निर्देश भी दिए गए।

बैठकें हुईं, निर्देश दिए गए, मुआवजा बंट गया और मौन भी रख लिया गया। बस इतना ही। लेकिन वह असल सवाल अब भी उसी टैंक में दफन है- इंसान को उस टैंक में उतारा ही क्यों गया? यह घटना एक कड़वा सच उजागर करती है कि हमारे देश में कानून की किताबें कितनी भी सख्त क्यों न हों, रसूखदारों की दहलीज पर आकर वे अक्सर अपना दम तोड़ देती हैं।

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