“किताबें मूक होती हैं, पर वही दुनिया का सबसे मुखर शोर पैदा करती हैं – जो समाज पढ़ना जानता है, वही इतिहास गढ़ना जानता है।”
लखनऊ (पब्लिक फोरम)। नवाबों के इस शहर की फिज़ाओं में आज से एक अलग ही खुशबू घुलने वाली है – किताबों की खुशबू। उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी लखनऊ में चारबाग स्थित ऐतिहासिक रवीन्द्रालय का प्रांगण आज से दस दिनों के लिए एक विशाल साहित्य-तीर्थ में बदल जाएगा। शाम पाँच बजे होने वाले भव्य उद्घाटन समारोह के साथ ही ‘लखनऊ पुस्तक मेला 2025’ का आगाज़ होगा – और इसके साथ शुरू होगा शब्दों, विचारों और संस्कृति का एक अविस्मरणीय उत्सव।
‘विकसित भारत, विकसित प्रदेश’ – विजन-2047 की बौद्धिक नींव
इस वर्ष मेले की थीम रखी गई है – ‘विकसित भारत, विकसित प्रदेश’, जो ‘विजन-2047’ को समर्पित है। यह थीम महज एक नारा नहीं, बल्कि उस बौद्धिक चेतना का आह्वान है जिस पर आने वाले कल के भारत की नींव रखी जानी है। जब राष्ट्र तरक्की के सपने देखता है, तो उन सपनों को आकार देती हैं किताबें – और यह मेला उसी सोच का सार्वजनिक उत्सव है।
मेले के आयोजक मनोज सिंह चंदेल के अनुसार, यह पुस्तक मेला सिर्फ खरीद-फरोख्त का बाज़ार नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक मंच है। यहाँ पुस्तक विमोचन, काव्य समारोह, आध्यात्मिक विमर्श, नाट्य मंचन और शास्त्रीय व लोक नृत्यों का ऐसा संगम होगा, जो इसे एक संपूर्ण साहित्यिक महोत्सव का स्वरूप देगा।
परंपरा और तकनीक का अनूठा संगम
यूपी मेट्रो रेल के सहयोग से आयोजित इस मेले में लगभग **60 स्टॉल** लगाए गए हैं। इस बार का सबसे दिलचस्प पहलू है – पुरानी जिल्दों और नई तकनीक का मेल। एक ओर जहाँ आधुनिक प्रिंटिंग तकनीक से तैयार दुर्लभ पुस्तकें पाठकों का इंतज़ार कर रही हैं, वहीं डिजिटल प्रकाशन से जुड़े नवाचार भी इस मेले की शान बढ़ाएंगे। शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से तैयार स्टॉल भी विशेष आकर्षण का केंद्र होंगे।
ज़ायका भी, ज़ज्बा भी — अवधी व्यंजन और कला का उत्सव
लखनऊ की संस्कृति कभी भी ‘ज़ायके’ के बिना पूरी नहीं होती। इसीलिए पुस्तक मेले के परिसर में ‘अवधी व्यंजन उत्सव’ भी आयोजित किया जा रहा है, जहाँ साहित्य प्रेमी किताबों के पन्नों के साथ-साथ नवाबी खानपान का लुत्फ़ भी उठा सकेंगे।
इसके अलावा, ‘वंदेमातरम’ के 150 गौरवशाली वर्षों के उपलक्ष्य में चित्रकारों द्वारा एक विशेष चित्र प्रदर्शनी और लाइव पेंटिंग का आयोजन किया जाएगा – जो देशभक्ति और सृजन का ऐसा संयोजन होगा जो हर आगंतुक के मन को छू जाएगा।
लखनऊ का यह पुस्तक मेला उस साझी विरासत का उत्सव है जहाँ कलम की धार को हमेशा से तलवार से अधिक शक्तिशाली माना गया है। स्क्रीन की चकाचौंध के इस दौर में पन्नों को पलटना एक साधना है। आइए, इन दस दिनों में रवीन्द्रालय की छाँव में अपनी रूह के लिए एक नई कहानी ढूंढें।





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