कोरबा (पब्लिक फोरम)। शहर के बीचों-बीच, ट्रांसपोर्ट नगर में एक ऐसा 100 बिस्तरों वाला मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल (शिवाय हॉस्पिटल) बड़े ही शानदार जश्न के साथ खुल गया है, जिसके पास मरीजों का इलाज करने का वैध लाइसेंस तक नहीं है। सबसे हैरानी की बात यह है कि अस्पताल प्रबंधन ने राज्य के एक कैबिनेट मंत्री को भी अंधेरे में रखकर उनसे इस अस्पताल का उद्घाटन करवा लिया। यह घटना सिर्फ एक सरकारी लापरवाही नहीं है, बल्कि उन आम लोगों के भरोसे के साथ एक बड़ा धोखा है, जो अपनी गाढ़ी कमाई लेकर बेहतर इलाज की आस में ऐसे अस्पतालों के दरवाजे पर पहुंचते हैं।
बताया जा रहा है कि ‘शिवाय फैमिली’ द्वारा शुरू किए गए इस अस्पताल के उद्घाटन समारोह में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल को भी आना था, लेकिन शायद उन्हें कुछ कमियों की भनक लग गई थी, इसलिए उन्होंने आखिरी वक्त पर आने से इंकार कर दिया। उद्घाटन से पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी हुई थी, जिसमें मीडिया को भी आधी-अधूरी और गोलमोल जानकारी दी गई।

जब इस पूरे मामले में मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMHO) डॉ. एस.एन. केसरी से बात की गई, तो उन्होंने साफ तौर पर कहा कि अस्पताल ने ऑनलाइन लाइसेंस के लिए आवेदन जरूर किया है, लेकिन अब तक उन्हें लाइसेंस जारी नहीं किया गया है। बिना लाइसेंस के अस्पताल में मरीजों की भर्ती और इलाज शुरू करना सीधे तौर पर नर्सिंग होम एक्ट का उल्लंघन है।
नियमों की उड़ी धज्जियां: कागजों में कहां हुआ खेल?
किसी भी बड़े अस्पताल को चलाने के लिए कई सख्त नियमों का पालन करना होता है, जो सीधे तौर पर मरीजों की सुरक्षा से जुड़े होते हैं। ऐसे में जांच का विषय यह है कि बिना लाइसेंस के यह अस्पताल खड़ा कैसे हो गया?
🔹फायर एंड सेफ्टी (आग से सुरक्षा): 100 बिस्तरों वाले अस्पताल में आग बुझाने की पुख्ता व्यवस्था और फायर विभाग की NOC (अनापत्ति प्रमाण पत्र) सबसे जरूरी है।
🔹चारों तरफ खुली जगह (एक्सेस): अस्पताल के चारों तरफ इतनी जगह होनी चाहिए कि आपात स्थिति में एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड की गाड़ियां आसानी से आ-जा सकें।
🔹खतरनाक रेडिएशन और कचरा: एक्स-रे और सिटी स्कैन जैसी मशीनों के लिए ‘एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड’ (AERB) और मेडिकल कचरे के निपटान के लिए पर्यावरण विभाग की अनुमति अनिवार्य है।
🔹नगर निगम और टाउन प्लानिंग: जमीन का सही उपयोग, नगर निगम से नक्शा पास होना और लिफ्ट व पानी की सुरक्षा के मानक पूरे होने चाहिए।
🔹डॉक्टरों का रजिस्ट्रेशन और फार्मेसी: इलाज करने वाले सभी डॉक्टर मेडिकल काउंसिल में रजिस्टर्ड होने चाहिए और फार्मेसी के लिए सेंट्रल ड्रग्स कंट्रोल के नियमों का पालन होना चाहिए।
इन सभी अनुमतियों और निरीक्षण रिपोर्ट की बारीकी से जांच होनी चाहिए ताकि यह पता चल सके कि किस विभाग के अधिकारियों ने नियमों को ताक पर रखकर आंखें मूंद लीं।
बस स्टैंड की भीड़ के बीच फंसी मरीजों की सांसें
इस पूरे मामले में सबसे डराने वाली बात अस्पताल की जगह (लोकेशन) है। शिवाय हॉस्पिटल का मुख्य द्वार सीधे शहर के व्यस्त और भीड़-भाड़ वाले अंतर्राज्यीय बस स्टैंड में खुलता है।
जरा सोचिए, एक तरफ जहां इंसान जिंदगी और मौत से जूझ रहा होता है, जहां एक-एक सेकंड कीमती होता है, वहां बाहर बसों का भयंकर शोर और जाम है। इस बस स्टैंड में दिन भर इतनी भीड़ होती है कि वहां ना तो एंबुलेंस के लिए रास्ता बचता है और ना ही पार्किंग की कोई जगह है। अगर कभी कोई अनहोनी हो जाए, तो इमारत के चारों तरफ फायर ब्रिगेड के घूमने की कोई जगह ही नहीं है। निगम के अधिकृत बस स्टैंड जैसी सार्वजनिक जगह पर इतने बड़े अस्पताल को खड़े होने की इजाजत आखिर किन परिस्थितियों में दे दी गई?
शहर में पनप रहे हैं ऐसे कई खतरे
यह कोरबा शहर की कोई अकेली कहानी नहीं है। शहर की तंग और संकरी गलियों में ऐसे कई निजी अस्पताल बिना किसी सुरक्षा मानकों के धड़ल्ले से चल रहे हैं। पास ही में एक और बड़ा अस्पताल चल रहा है, जिसके चारों तरफ भी एंबुलेंस या दमकल के जाने का कोई रास्ता नहीं है। बीते सालों में जब भी स्वास्थ्य विभाग ने जांच की, कई खामियां पाई गईं, लेकिन वे फाइलें हमेशा के लिए धूल फांकने लगीं। जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हुई और ठोस कार्रवाई किसी पर नहीं हुई।
अब आगे क्या?
एक आम इंसान जब बीमार पड़ता है, तो वह अपना घर, जमीन और जेवर गिरवी रखकर बड़े अस्पतालों का रुख करता है। वह सुविधाओं के नाम पर भारी-भरकम फीस चुकाता है। ऐसे में, यह जानने का उसका पूरा हक है कि जिस छत के नीचे वह अपनी या अपने अपनों की जान सौंप रहा है, क्या वह सुरक्षित और कानूनी रूप से वैध है या नहीं?
“शिवाय हॉस्पिटल का यह मामला हमारे स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन के लिए एक खुली चुनौती है। अब देखना यह है कि प्रशासन के आला अफसर नींद से जागकर स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर खुलेआम नियम तोड़ने वाले इन संचालकों पर कोई सख्त कार्रवाई करते हैं, या फिर किसी बड़े हादसे के होने का इंतजार करते हैं। नियमों को दरकिनार कर खड़ी की गई ये इमारतें सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं हैं, बल्कि बेबस मरीजों की जान पर लटकती हुई तलवार हैं। प्रशासन को तुरंत इस मामले में दखल देकर आम जनता के भरोसे और उनकी जिंदगी की रक्षा करनी चाहिए।”





Recent Comments