लोकतांत्रिक असहमति पर पहरा: विधानसभा मार्च से पहले CPI(ML) नेताओं की नजरबंदी पर गरमाई राजनीति
लखनऊ (पब्लिक फोरम)। उत्तर प्रदेश में ‘बुलडोजर राज’ और सुलगते जन-मुद्दों के खिलाफ 23 फरवरी को प्रस्तावित भाकपा (माले) [CPI(ML)] के विधानसभा मार्च से ठीक पहले पुलिस की कार्रवाई ने सूबे का सियासी पारा चढ़ा दिया है। मार्च की पूर्व संध्या (22 फरवरी) पर राज्य के कई जिलों में पार्टी के प्रमुख नेताओं को उनके घरों में ही नजरबंद कर दिया गया है। CPI(ML) लिबरेशन ने इसे सीधे तौर पर “लोकतांत्रिक असहमति का गला घोंटने की दमनात्मक कोशिश” करार देते हुए इस पुलिसिया कार्रवाई की कड़ी निंदा की है।
नेताओं की नजरबंदी और सरकार पर उठते सवाल
CPI(ML) लिबरेशन के यूपी राज्य सचिव सुधाकर यादव ने इस धर-पकड़ और नजरबंदी पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने बताया कि पीलीभीत में पार्टी के जिला सचिव कॉमरेड देवाशीष, जो अपने साथियों के साथ लखनऊ कूच की अंतिम तैयारियों में जुटे थे, उनके आवास पर अचानक पुलिस पहुंची और उन्हें नजरबंद कर दिया। ठीक इसी तरह की कार्रवाई सीतापुर में भी हुई, जहां जिला सचिव और जिला पंचायत सदस्य कॉमरेड अर्जुन लाल को उनके घर से बाहर निकलने पर रोक लगा दी गई। प्रदेश के अन्य जिलों से भी ऐसी ही पुलिसिया सख्ती की खबरें सामने आ रही हैं।
प्रशासन की इस कार्रवाई पर सवाल खड़े करते हुए राज्य सचिव ने कहा, “सरकार की नीतियों से त्रस्त लोग शांतिपूर्वक अपनी मांगें राज्य के सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच – विधानसभा – के सामने रखने आ रहे हैं। ऐसे में सरकार आखिर किस बात से डर रही है? जिलों में नेताओं को क्यों रोका जा रहा है?”
आखिर क्या हैं विधानसभा मार्च की प्रमुख मांगें?
यह विधानसभा मार्च मुख्य रूप से हाशिए पर धकेल दिए गए समुदायों—गरीबों, मजदूरों, किसानों और छात्रों—की उन तात्कालिक और लंबित मांगों को स्वर देने के लिए बुलाया गया है, जिन्हें लंबे समय से अनसुना किया जा रहा है। इस शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक लामबंदी के मुख्य मुद्दे निम्नलिखित हैं:
🔸बुलडोजर कार्रवाई पर रोक: मनमाने तरीके से हो रही बेदखली को तुरंत रोकना और गरीबों के लिए जमीन के अधिकार की कानूनी गारंटी सुनिश्चित करना।
🔸किसानों और आदिवासियों के अधिकार: किसानों को कर्ज के भारी बोझ से मुक्ति दिलाना और वनाधिकारों की सख्ती से रक्षा करना।
🔸शिक्षा और रोजगार: ‘UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026’ को प्रदेश में लागू करना और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसरों का विस्तार करना।
🔸कर्मियों का सम्मान: आशा वर्कर सहित अन्य योजना कर्मियों को नियमित सरकारी कर्मचारी का दर्जा देना और उन्हें सम्मानजनक वेतन मुहैया कराना।
🔸मनरेगा: ग्रामीण रोजगार की रीढ़ ‘मनरेगा’ को पूरी तरह से बहाल कर उसे और अधिक मजबूत बनाना।
CPI(ML) की दो टूक: संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का संकल्प होगा और मजबूत
भाकपा (माले) ने प्रशासन से दो टूक मांग की है कि नजरबंद किए गए सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को अविलंब रिहा किया जाए और उन्हें 23 फरवरी के विधानसभा मार्च में स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखने का अवसर दिया जाए। पार्टी ने यह भी स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति को बलपूर्वक दबाने की कोई भी कोशिश, जनता के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के संकल्प को कमजोर करने के बजाय उसे और अधिक मजबूती प्रदान करेगी।





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