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सोमवार, फ़रवरी 23, 2026
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अडानी की कोरबा पावर परियोजना पर बड़ा सवाल: Draft EIA में हेराफेरी का आरोप, पर्यावरण मंत्रालय ने मांगी रिपोर्ट

कोरबा की सांसें खतरे में? अदानी के 1600 MW विस्तार पर INTUC ने उठाए गंभीर सवाल

कोरबा (पब्लिक फोरम)। देश के सबसे प्रदूषित औद्योगिक शहरों में शुमार कोरबा एक बार फिर विकास बनाम पर्यावरण की बहस के केंद्र में आ खड़ा हुआ है। इस बार निशाने पर है अदानी ग्रुप की सहायक कंपनी कोरबा पावर लिमिटेड (KPL)की प्रस्तावित 2×800 मेगावाट (फेज-III) कोयला आधारित ताप विद्युत विस्तार परियोजना – और आरोप है कि इस परियोजना की पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट (Draft EIA) में सच्चाई को जानबूझकर दबाया गया है।

मंत्रालय ने लिया संज्ञान, जारी हुए निर्देश
मामला इतना गंभीर है कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार को स्वयं हस्तक्षेप करना पड़ा। मंत्रालय ने पत्र क्रमांक IA-Z-12011/26/2026-IA-I (दिनांक 20 फरवरी 2026) के माध्यम से उप वन महानिदेशक (C), रायपुर को निर्देश दिए हैं कि वे तथ्यात्मक स्थिति एवं पर्यावरणीय स्वीकृति की शर्तवार अनुपालन रिपोर्ट तत्काल प्रस्तुत करें।

यह निर्देश इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (INTUC) के जिला अध्यक्ष शशांक दुबे एवं जिला सचिव संजय कुमार पटेल द्वारा दर्ज कराई गई उन आपत्तियों के बाद आए हैं, जो उन्होंने 27 फरवरी 2026 को प्रस्तावित जनसुनवाई से पूर्व केंद्र सरकार के समक्ष रखी थीं।

Draft EIA पर क्या हैं आरोप?
INTUC नेताओं का आरोप है कि परियोजना की Draft EIA Report में पर्यावरणीय प्रभावों, प्रदूषण स्तर, भूजल की स्थिति, राख निस्तारण, वन भूमि, स्थानीय ग्रामों पर दुष्प्रभाव और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को या तो कम करके दिखाया गया है या फिर अधूरे तरीके से प्रस्तुत किया गया है।

सबसे गंभीर आरोप यह है कि इस भ्रामक जानकारी के जरिए 27 फरवरी की जनसुनवाई में स्थानीय जनता को गुमराह कर कृत्रिम सहमति हासिल करने की सुनियोजित साजिश रची गई है।यानी जिस प्रक्रिया को लोकतांत्रिक और पारदर्शी होना चाहिए, उसे ही हथियार बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

इसके अलावा, वर्ष 2004, 2025 और संशोधन 2025 में दी गई पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृतियों की शर्तों के अनुपालन की स्वतंत्र एवं पारदर्शी जांच की भी मांग की गई है। मामले की प्रति केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और छत्तीसगढ़ राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी भेजी जा चुकी है।

शशांक दुबे की दो टूक: “यह जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ है”
श्री शशांक दुबे ने कहा – “कोरबा पहले से ही देश के सर्वाधिक प्रदूषित औद्योगिक क्षेत्रों में से एक है। ऐसे में यदि विस्तार परियोजना के Draft EIA में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है, तो यह न केवल पर्यावरण कानूनों का खुला उल्लंघन है, बल्कि यहाँ के लाखों लोगों के स्वास्थ्य और अधिकारों के साथ भी गंभीर खिलवाड़ है। जनसुनवाई पारदर्शी, तथ्यात्मक और निष्पक्ष होनी चाहिए – यह माँग नहीं, यह अधिकार है।”

INTUC की पाँच प्रमुख माँगें
INTUC ने इस मामले में पाँच ठोस माँगें रखी हैं: —
🔸पहली— Draft EIA की स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति से पुनः जांच हो।
🔸दूसरी— 27 फरवरी की जनसुनवाई को स्थगित कर वास्तविक एवं संशोधित EIA प्रस्तुत की जाए।
🔸तीसरी— सभी पूर्व EC शर्तों के अनुपालन की जानकारी सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कराई जाए।
🔸चौथी— यदि भ्रामक तथ्यों की पुष्टि हो, तो संबंधित अधिकारियों एवं कंपनी के विरुद्ध कड़ी विधिक कार्रवाई की जाए।
🔸पाँचवीं और सबसे मानवीय माँग— वर्ष 2004-2007 की 600 MW परियोजना से प्रभावित शेष 30 भू-विस्थापितों को नई 660×2 MW इकाई में स्थायी रोजगार दिया जाए। साथ ही 2011-12 के भू-अधिग्रहण से प्रभावित लोगों को भी नई 600×2 MW इकाई में योग्यतानुसार स्थायी नौकरी, स्वास्थ्य सुविधाएं और वेतन समझौते के तहत सभी कर्मचारी लाभ प्रदान किए जाएं।

कोरबा – विकास की कीमत चुकाता शहर
कोरबा छत्तीसगढ़ की ऊर्जा राजधानी है – देश को बिजली देने वाला वह शहर, जो खुद दशकों से प्रदूषण की मार झेल रहा है। यहाँ पहले से ही कई बड़े ताप विद्युत संयंत्र कार्यरत हैं। ऐसे में बिना पारदर्शी और विश्वसनीय पर्यावरणीय आकलन के 1600 मेगावाट की एक और विशाल परियोजना का विस्तार – और वह भी संदिग्ध EIA के आधार पर – स्थानीय जनता, पर्यावरणविदों और श्रमिक संगठनों की चिंता को स्वाभाविक बनाता है।

अब सबकी नजरें पर्यावरण मंत्रालय, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और जिला प्रशासन पर हैं – कि वे इस दबाव में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं, या फिर एक बार फिर विकास के नाम पर सच्चाई को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

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