नई दिल्ली (पब्लिक फोरम)। देश के संगठित और असंगठित श्रमिक वर्ग के सामने आज अभूतपूर्व संकट खड़ा है। एआईसीसीटीयू (ऐक्टू) सहित केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने श्रमिक अधिकारों पर केंद्र सरकार के चौतरफा हमलों के खिलाफ 12 फरवरी 2026 को अखिल भारतीय आम हड़ताल का आह्वान किया है। यह हड़ताल केवल विरोध का प्रतीक नहीं, बल्कि देश के मेहनतकशों के अस्तित्व, सम्मान और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए निर्णायक संघर्ष का ऐलान है।
मोदी सरकार ने 29 श्रम कानूनों को समाप्त कर उनकी जगह चार लेबर कोड लागू करने की पूरी तैयारी कर ली है। 21 नवंबर को अधिसूचना जारी होने के बाद, इनके क्रियान्वयन के लिए केंद्रीय नियम बनाए जा रहे हैं और 1 अप्रैल 2026 से इन्हें लागू करने की योजना है। सरकार इन कोडों को ‘श्रमिक हितैषी सुधार’ बताकर प्रचारित कर रही है, जबकि वास्तविकता यह है कि ये कोड श्रमिकों को कानूनी सुरक्षा से वंचित कर उन्हें पूंजीपतियों के अधीन करने का साधन हैं।
ट्रेड यूनियनों का स्पष्ट आरोप है कि ये लेबर कोड मजदूरों को सौ–डेढ़ सौ वर्ष पीछे धकेल देंगे। बड़े पैमाने पर श्रमिकों को ‘श्रमिक’ की परिभाषा से बाहर कर दिया जाएगा, जिससे उनका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। जिन श्रम कानूनों को भारतीय जनता ने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लंबे संघर्ष और बलिदानों से हासिल किया था, उन्हें समाप्त करना संविधान पर सीधा हमला है। यह उस व्यापक साजिश का हिस्सा है, जिसके तहत लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर किया जा रहा है।
सरकार का तथाकथित ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ मॉडल दरअसल श्रमिकों का शोषण कर कॉरपोरेट मुनाफे को सुनिश्चित करने की नीति है। इन कोडों को आरएसएस-भाजपा से जुड़ी ट्रेड यूनियन बीएमएस के समर्थन से आगे बढ़ाया गया है। साथ ही, श्रम शक्ति नीति 2025 के माध्यम से श्रम को अधिकार नहीं, बल्कि ‘धर्म’ के रूप में परिभाषित किया जा रहा है, जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
इसी क्रम में सरकार ने मनरेगा को समाप्त कर ‘विकसित भारत–रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) कानून, 2025’ यानी वीबी-ग्रामजी कानून लागू किया है। महात्मा गांधी का नाम हटाकर लाया गया यह कानून अधिकार-आधारित रोजगार गारंटी को खत्म करता है और ग्रामीण रोजगार को केंद्र सरकार की मनमर्जी पर छोड़ देता है। कटाई के मौसम में काम पर रोक, राज्यों पर वित्तीय बोझ और ग्रामीण मजदूरों को शहरों की ओर पलायन के लिए मजबूर करने जैसी व्यवस्थाएं इस कानून के असली उद्देश्य को उजागर करती हैं—उद्योगों के लिए सस्ते श्रम की विशाल सेना तैयार करना।
इसके साथ ही, कोयला, रेल, रक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रों में तेज़ निजीकरण, बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत एफडीआई, विद्युत (संशोधन) विधेयक 2025, बीज विधेयक और परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी व विदेशी कंपनियों के हवाले करने जैसे फैसले देश की आर्थिक संप्रभुता और सामाजिक सुरक्षा पर गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं। ट्रेड यूनियनों का कहना है कि ये सभी कदम ‘विकसित भारत’ के नाम पर चंद कॉरपोरेट घरानों के हित में उठाए जा रहे हैं।
मजदूर संगठनों का आरोप है कि इस तथाकथित विकास मॉडल में अमीरी-गरीबी की खाई अपने चरम पर पहुंच चुकी है। गरीबों को अधिकारों, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से वंचित कर उन्हें 12 घंटे के श्रम, पुलिस राज, बुलडोजर राज और सांप्रदायिक विभाजन की व्यवस्था में झोंका जा रहा है। यहां तक कि लोकतांत्रिक अधिकारों पर भी हमले तेज़ हो गए हैं।
इन्हीं हालातों के खिलाफ केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने 12 फरवरी 2026 की अखिल भारतीय आम हड़ताल का ऐलान किया है। संयुक्त किसान मोर्चा ने इस हड़ताल को अपना पूर्ण समर्थन दिया है। श्रमिक संगठनों ने देश के समस्त मेहनतकश वर्ग, किसानों और आम जनता से व्यापक अभियान चलाकर इस हड़ताल को ऐतिहासिक रूप से सफल बनाने की अपील की है।
ट्रेड यूनियनों का स्पष्ट संदेश है कि जैसे किसानों ने एकजुट संघर्ष से काले कृषि कानूनों को रद्द कराया, उसी दृढ़ता, एकता और संकल्प के साथ श्रमिक वर्ग को भी लेबर कोड, वीबी-ग्रामजी कानून और निजीकरण के खिलाफ लंबी लड़ाई के लिए तैयार होना होगा। 12 फरवरी की हड़ताल इसी निर्णायक संघर्ष की शुरुआत है – जहां सवाल केवल कानूनों का नहीं, बल्कि देश के भविष्य और मेहनतकशों के सम्मान का है।





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