कोरबा (पब्लिक फोरम)। अक्सर कहा जाता है कि पत्रकार समाज का आईना होते हैं, जो सरकार और जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं। लेकिन जब इसी ‘चौथे स्तंभ’ को मान-सम्मान के बजाय उपेक्षा मिले, तो उसका दर्द छलकना स्वाभाविक है। छत्तीसगढ़ की ऊर्जाधानी कोरबा में कुछ ऐसा ही मंजर देखने को मिला, जहां मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों ने प्रशासन की बदइंतजामी से नाराज होकर कवरेज का सामूहिक बहिष्कार कर दिया। यह घटना न केवल प्रशासनिक लापरवाही की पोल खोलती है, बल्कि यह भी सवाल उठाती है कि क्या सिस्टम की नजर में कलम के सिपाहियों की कोई अहमियत नहीं है?
क्या है पूरा मामला?
कोरबा में मुख्यमंत्री के एक अहम कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम को कवर करने के लिए जिले भर से पत्रकार, छायाकार और मीडियाकर्मी बड़ी संख्या में पहुंचे थे। उम्मीद थी कि वीआईपी दौरे के मद्देनजर प्रशासन ने पुख्ता इंतजाम किए होंगे। लेकिन मौके पर पहुंचकर पत्रकारों को निराशा हाथ लगी।
पत्रकारों के लिए न तो बैठने की उचित व्यवस्था थी और न ही धूप से बचाव का कोई इंतजाम। मीडिया गैलरी को खुली धूप में छोड़ दिया गया था, जबकि अन्य अतिथियों और अधिकारियों के लिए छायादार और सुविधाजनक व्यवस्था की गई थी।

क्यों भड़का पत्रकारों का गुस्सा?
पत्रकारों की नाराजगी का कारण सिर्फ धूप या कुर्सी नहीं थी, बल्कि वह दोयम दर्जे का व्यवहार था, जिसने उनके स्वाभिमान को चोट पहुंचाई।
अपमानजनक स्थिति: चिलचिलाती धूप में घंटों खड़े रहकर कवरेज करना किसी सजा से कम नहीं था।
अनसुनी: जब पत्रकारों ने वहां मौजूद अधिकारियों से व्यवस्था सुधारने का आग्रह किया, तो उसे अनसुना कर दिया गया।
सम्मान की बात: पत्रकारों का कहना था कि वे यहां अपना काम करने आए थे, लेकिन प्रशासन का रवैया ऐसा था मानो उन पर कोई एहसान किया जा रहा हो।
इस अपमान को बर्दाश्त करने के बजाय, वहां मौजूद सभी पत्रकारों ने एक सुर में विरोध जताया और कार्यक्रम के कवरेज का बहिष्कार करने का कठोर निर्णय लिया। उन्होंने कैमरे बंद किए, कलम अपनी जेब में रखी और कार्यक्रम स्थल से बाहर निकल आए।
प्रशासन के लिए सबक
यह घटना प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक बड़ा सबक है। जब किसी राज्य के मुखिया का कार्यक्रम हो, तो वहां हर छोटी-बड़ी व्यवस्था चाक-चौबंद होनी चाहिए। मीडिया को नजरअंदाज करना या उन्हें अपमानित करना न केवल कार्यक्रम की छवि खराब करता है, बल्कि सरकार और मीडिया के रिश्तों में भी कड़वाहट घोलता है।
कोरबा की यह घटना सिर्फ एक बहिष्कार नहीं, बल्कि उस ‘सिस्टम’ के खिलाफ एक मूक हुंकार है, जो अक्सर काम करने वालों की गरिमा को भूल जाता है। उम्मीद है कि प्रशासन इस घटना से सबक लेगा और भविष्य में यह सुनिश्चित करेगा कि लोकतंत्र के प्रहरी जब अपना काम करने आएं, तो उन्हें धूप में जलना न पड़े, बल्कि उन्हें वह सम्मान मिले जिसके वे हकदार हैं। आखिर, सम्मान का लेन-देन ही एक स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है।





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