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शुक्रवार, जनवरी 23, 2026
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1517 दिनों के संघर्ष की जीत: 37 साल बाद भू-विस्थापित किसान को मिला जमीन के बदले रोजगार; कुसमुंडा में आंदोलनकारियों ने बांटी मिठाइयां

कोरबा/कुसमुंडा। (पब्लिक फोरम) जमीन के बदले रोजगार की मांग को लेकर वर्षों से संघर्ष कर रहे भू-विस्थापित किसानों को आखिरकार बड़ी सफलता मिली है। 1517 दिनों तक चले अनिश्चितकालीन धरने और कई बार खदान बंदी जैसे कड़े आंदोलनों के बाद एसईसीएल के बिलासपुर मुख्यालय ने पुराने लंबित रोजगार प्रकरण में नियमों को शिथिल करते हुए रोजगार देने का एप्रुवल आदेश जारी किया। आदेश के अनुपालन में कुसमुंडा क्षेत्र के महाप्रबंधक सचिन तानाजी पाटिल ने भू-विस्थापित किसान रघुनंदन यादव को नियुक्ति पत्र सौंपा।

नियुक्ति पत्र सौंपते हुए महाप्रबंधक सचिन तानाजी पाटिल ने रघुनंदन यादव को एसईसीएल परिवार में शामिल होने पर शुभकामनाएं दीं और आश्वस्त किया कि जिन किसानों की भूमि अधिग्रहित की गई है, उन्हें नियमानुसार रोजगार उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में तेजी लाई जाएगी। इस अवसर पर कुसमुंडा एपीएम, भू-राजस्व विभाग सहित अन्य अधिकारी भी उपस्थित रहे।

इस महत्वपूर्ण जीत की खबर मिलते ही आंदोलन स्थल पर उत्साह का माहौल बन गया। किसान सभा और भू-विस्थापित रोजगार एकता संघ के कार्यकर्ताओं ने जीएम कार्यालय के सामने मिठाइयां बांटकर खुशी जाहिर की। हालांकि आंदोलनकारियों ने साफ किया कि यह लड़ाई यहीं समाप्त नहीं होगी। सभी प्रभावित परिवारों को रोजगार मिलने तक आंदोलन जारी रहेगा।

उल्लेखनीय है कि कुसमुंडा कोयला खदान विस्तार के लिए वर्ष 1978 से 2004 के बीच जरहा जेल, बरपाली, दुरपा, खम्हरिया, मनगांव, बरमपुर, दुल्लापुर, जटराज, सोनपुरी, बरकुटा, गेवरा, भैसमा सहित अनेक गांवों में हजारों किसानों की भूमि का अधिग्रहण किया गया था। उस समय एसईसीएल की नीति ‘जमीन के बदले रोजगार’ की थी, लेकिन बड़ी संख्या में प्रभावित परिवारों को रोजगार नहीं मिला। बाद में नीति बदलकर न्यूनतम दो एकड़ भूमि अधिग्रहण पर एक रोजगार की शर्त लागू कर दी गई, जिससे अधिकांश छोटे और सीमांत किसान रोजगार के अधिकार से वंचित हो गए।

इसी अन्याय के खिलाफ पिछले 1517 दिनों से छत्तीसगढ़ किसान सभा के सहयोग से ‘भू-विस्थापित रोजगार एकता संघ’ के बैनर तले आंदोलन चलाया जा रहा था। आंदोलनकारी भूमि अधिग्रहण के समय लागू पुरानी नीति के अनुसार सभी प्रभावित खातेदारों को रोजगार देने की मांग कर रहे थे। इस लंबे संघर्ष में बरपाली गांव के रघुनंदन यादव का मामला प्रतीक बनकर सामने आया, जिनकी जमीन वर्ष 1988 में अधिग्रहित हुई थी। 37 वर्षों तक रोजगार के लिए भटकने के बाद अब उन्हें नियुक्ति पत्र मिला है।

इस अवसर पर आयोजित सभा को संबोधित करते हुए छत्तीसगढ़ किसान सभा के प्रदेश संयुक्त सचिव प्रशांत झा ने कहा कि किसानों के पास जीविका का एकमात्र साधन जमीन होती है। जब वही जमीन छीनी जाती है, तो स्थायी रोजगार देना कंपनी की नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है। उन्होंने इसे भू-विस्थापितों के संघर्ष की बड़ी जीत बताते हुए कहा कि यह साबित करता है कि संगठित और निरंतर संघर्ष से अधिकार हासिल किए जा सकते हैं।

भू-विस्थापित रोजगार एकता संघ के रेशम यादव और दामोदर श्याम ने कहा कि पुराने लंबित प्रकरणों में रोजगार देने के आदेश से आंदोलन को नई ऊर्जा मिली है और अन्य भू-विस्थापितों में भी उम्मीद जगी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एकजुट होकर संघर्ष करने से ही सभी प्रभावितों को उनका हक मिलेगा।

नियुक्ति पाने वाले रघुनंदन यादव ने कहा कि जमीन अधिग्रहण के बाद वे वर्षों तक दफ्तरों के चक्कर काटते रहे, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। संघर्ष के दौरान उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी थी, पर छत्तीसगढ़ किसान सभा के मार्गदर्शन और एकजुट आंदोलन ने न्याय दिलाया। उन्होंने इसे केवल अपनी नहीं, बल्कि सभी भू-विस्थापित किसानों की जीत बताया।

1517 दिनों का यह संघर्ष न केवल एक व्यक्ति को रोजगार दिलाने की कहानी है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर सवाल भी है, जिसने दशकों तक किसानों को उनके अधिकार से वंचित रखा। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह फैसला अन्य भू-विस्थापित परिवारों के लिए भी न्याय का रास्ता खोलेगा।

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