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गुरूवार, जनवरी 22, 2026
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इलेक्टोरल ट्रस्ट और चंदे का गणित: क्या 82 प्रतिशत की हिस्सेदारी लोकतंत्र में ‘समान अवसर’ को खत्म कर रही है?

चंदे का ‘लोकतंत्र’ और बेबस विपक्ष

“पारदर्शिता के नाम पर केवल माध्यम बदला है, सत्ता की तिजोरी का एकाधिकार आज भी बदस्तूर जारी है।”

भारतीय राजनीति में धनबल की भूमिका हमेशा से विवादास्पद रही है, लेकिन हालिया आंकड़े बताते हैं कि अब यह केवल विवाद नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक असंतुलन का एक खतरनाक मोड़ ले चुका है। इलेक्टोरल बॉन्ड को सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘असंवैधानिक’ घोषित किए जाने के बाद उम्मीद थी कि चंदे की व्यवस्था में अधिक पारदर्शिता और समानता आएगी। मगर इलेक्टोरल ट्रस्ट के माध्यम से वर्ष 2024-25 में आए चंदे के आंकड़ों ने इस उम्मीद पर पानी फेर दिया है। जब कुल चंदे का 82 प्रतिशत हिस्सा केवल एक दल यानी भारतीय जनता पार्टी की झोली में जाता है, तो सवाल केवल फंडिंग का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सेहत का हो जाता है।

ट्रस्ट की आड़ में ‘कॉरपोरेट’ प्रेम
आंकड़े गवाह हैं कि ‘प्रूडेंट’ और ‘प्रोग्रेसिव’ जैसे इलेक्टोरल ट्रस्ट अब राजनीतिक चंदे के नए ‘हाईवे’ बन गए हैं। एक साल के भीतर इलेक्टोरल ट्रस्ट के चंदे में तीन गुना से अधिक की वृद्धि यह दर्शाती है कि कॉरपोरेट जगत और सत्ता के बीच का रिश्ता बॉन्ड के बंद होने से टूटा नहीं, बल्कि और अधिक संस्थागत हो गया है। प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट ने अपने कुल फंड का 82% से ज्यादा हिस्सा सत्ताधारी दल को दिया, जबकि मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को केवल 8% के करीब मिला। यह खाई बताती है कि ‘पूंजी’ हमेशा सत्ता की ढाल बनना पसंद करती है।

पारदर्शिता: भ्रम या हकीकत?
इलेक्टोरल बॉन्ड के मुकाबले इलेक्टोरल ट्रस्ट में यह तो पता चलता है कि किस कंपनी ने पैसा दिया और किस पार्टी को मिला, लेकिन यह ‘किस’ और ‘क्यों’ के बीच की कड़ी अभी भी धुंधली है। क्या यह महज संयोग है कि जिन कंपनियों ने करोड़ों का दान दिया, उनमें से कई बड़ी परियोजनाओं या विनियामक (Regulatory) जांच के घेरे में रहीं? ट्रस्ट को मिला 95% पैसा उसी साल वितरित करना अनिवार्य है, लेकिन किस पार्टी को कितना मिलेगा, इसका निर्णय ट्रस्ट के बोर्ड लेते हैं। यह बोर्ड का ‘विवेक’ है या सत्ता का ‘निर्देश’, इसकी कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं है।

असंतुलित रणक्षेत्र: संसाधनों की जंग
लोकतंत्र का मूल मंत्र है—सबको बराबरी का हक। लेकिन जब चुनावी खर्च, विज्ञापन और कैम्पेन क्षमता में जमीन-आसमान का अंतर हो, तो चुनाव केवल नीतियों की नहीं, बल्कि संसाधनों की जंग बन जाते हैं। सत्ता पक्ष के पास ₹3,112 करोड़ का फंड होना और विपक्ष का ₹300 करोड़ पर सिमट जाना, चुनावी दौड़ को शुरू होने से पहले ही एकतरफा बना देता है। यह वित्तीय विषमता क्षेत्रीय दलों और छोटे संगठनों की आवाज को कुचलने के लिए पर्याप्त है।

सुप्रीम कोर्ट ने बॉन्ड को अवैध मानकर एक दरवाजा बंद किया था, लेकिन राजनीति ने खिड़की खोल ली है। जब तक चंदे की प्रक्रिया में ‘कैपिंग’ (सीमा निर्धारण) और चंदा देने वाली कंपनियों के लाभ-हानि के साथ उनके दान का ऑडिट नहीं होता, तब तक पारदर्शिता एक किताबी शब्द ही रहेगी। लोकतंत्र में चंदा केवल पार्टी चलाने का साधन होना चाहिए, न कि सत्ता खरीदने का निवेश। यदि संसाधनों का यह भारी असंतुलन बना रहा, तो ‘बहुमत’ का शासन ‘पूंजी’ का शासन बनकर रह जाएगा।
(आलेख: प्रदीप शुक्ल)

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