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गुरूवार, जनवरी 22, 2026
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क्या गरीबी आपका भाग्य है या व्यवस्था की साजिश? वह कड़वा सच जो हमें नहीं दिखता

🔹वे सच जो हमें नहीं दिखते

एक किसान का बेटा जब खेत में काम करता है, तो उसे लगता है कि यही उसकी नियति है। एक मजदूर जब कारखाने में पसीना बहाता है, तो सोचता है कि गरीबी ही उसका भाग्य है। एक लड़की जब घर के कामों में उलझी रहती है, तो मान लेती है कि यही उसका स्वभाव है। लेकिन क्या कभी हमने सोचा कि ये विचार आए कहाँ से? क्या ये सचमुच हमारे अपने खुद के विचार हैं, या किसी और की आवाज़ है जो हमारे भीतर गूँज रही है?

दर्पण में दिखता झूठ
हम सब एक अजीब दुनिया में जीते हैं। यहाँ जो भी दिखता है, वह सच नहीं होता। और जो सच होता है, वह दिखता नहीं। जैसे किसी जादूगर ने हमारी आँखों पर पर्दा डाल दिया हो। हम मानते हैं कि राजा इसलिए राजा है क्योंकि उसमें कुछ खास गुण होते हैं। मालिक इसलिए मालिक है क्योंकि वह होशियार और ताकतवर है। और गरीब इसलिए गरीब है क्योंकि वह आलसी और कमजोर है।

लेकिन सच्चाई बिल्कुल उलटी है। राजा इसलिए राजा है क्योंकि उसके पास राज सत्ता है, सेना है। मालिक इसलिए मालिक है क्योंकि उसके पास जमीन और कारखाने हैं। और गरीब इसलिए गरीब है क्योंकि उसके पास कुछ भी नहीं है, सिवाय उसके अपने हाथों के।

यह जादू कैसे चलता है? यह समझने के लिए हमें एक सरल सी बात समझनी ही होगी – जो हमारी रोजी-रोटी को नियंत्रित करता है, वही हमारे दिमाग को भी नियंत्रित करता है।

रोटी और विचार का रिश्ता
मान लीजिए एक गाँव है। सदियों से वहाँ खेती होती आई है। जमींदार के पास जमीन है, किसान के पास सिर्फ मेहनत। किसान खेत में काम करता है, फसल उगाता है, लेकिन उपज का एक बहुत बड़ा हिस्सा जमींदार ले लेता है। अब इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सिर्फ बल प्रयोग ही काफी नहीं है। जमींदार को यह भी चाहिए कि किसान खुद ही यह मान ले कि यह व्यवस्था सही है, न्यायपूर्ण है, और ईश्वर की बनाई हुई है।

तो फिर आगे क्या होता है? पंडित मंदिर में प्रवचन देता है कि कर्म का फल भोगना ही  पड़ता है, पिछले जन्म के पाप इस जन्म में सजा बनकर आते हैं। स्कूल में बच्चों को पढ़ाया जाता है कि समाज में हर किसी की अपनी जगह होती है, और उसे उसी में संतुष्ट रहना चाहिए। गीतों-कहानियों में भी  सुनाया जाता है कि राजा प्रजा का पिता होता है, और प्रजा को आज्ञाकारी संतान की तरह रहना चाहिए।

धीरे-धीरे किसान भी यही सोचने लगता है। उसे लगता है कि उसकी गरीबी उसके भाग्य में लिखी है। वह अपनी दुर्दशा के लिए खुद को दोषी मानने लगता है, न कि उस व्यवस्था को जिसने उसे लूटा है।

यही है वह जादू। यही है विचारधारा की ताकत। शासक वर्ग को बंदूक की जरूरत ही नहीं पड़ती अगर उसने अपने शासित वर्ग के दिमाग पर कब्जा कर लिया हो।

जब पुरानी दुनिया टूटती है
लेकिन कोई भी व्यवस्था हमेशा नहीं टिकती। इतिहास कभी रुकता नहीं, वह  निरंतर आगे ही बढ़ता रहता है। और जब आर्थिक व्यवस्था और रोजी-रोटी की परिस्थिति बदलती है, तो विचारों की दुनिया भी बदल जाती है।

सोचिए, सदियों तक लोग मानते थे कि राजा ईश्वर का प्रतिनिधि है, उसके आदेश को टालना पाप है। फिर व्यापार बढ़ा, शहर बने, नए व्यापारी वर्ग का उदय हुआ। इस नए वर्ग को राजा की मनमानी पसंद नहीं आई। उन्हें नियम चाहिए थे, कानून चाहिए थे, स्वतंत्रता चाहिए थी, व्यापार चाहिए था, मुक्त व्यापार।

और अचानक नए विचार उभरने लगे – लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा। दार्शनिक आए जिन्होंने कहा कि राजा ईश्वर का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि जनता का सेवक है। कलाकारों ने ऐसे गीत गाए जो राजशाही के खिलाफ थे। क्रांतियां हुईं। और पुरानी व्यवस्था ध्वस्त हो गई।

क्या यह संयोग था? बिल्कुल नहीं। यह इतिहास का नियम है। जब उत्पादन और रोजी-रोटी के साधन बदलते हैं, फिर आर्थिक संबंध भी बदलते हैं, तो विचार भी अपने आप बदलते जाते हैं। पुराने विचार टूटते चले जाते हैं क्योंकि वे नई वास्तविकता में काम नहीं आते।

हमारे समय का सच
आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं। चारों ओर से हमें एक ही संदेश मिलता है – प्रतियोगिता करो, आगे निकलो, सफल बनो, अमीर बनो। स्कूल में बच्चों को सिखाया जाता है कि जीवन एक दौड़ है। टीवी पर विज्ञापन बताते हैं कि खुशी खरीदने में है। नेता कहते हैं कि विकास का मतलब है कारखाने और मॉल। लेकिन क्या कभी हमने पूछा कि यह विचार आखिरकार आया कहाँ से? और यह विचार किसके हित में होता है?

आज का शासक वर्ग पूँजीपति है। उसके पास कारखाने हैं, कंपनियाँ हैं, बैंक हैं, पूरा सिस्टम है। उसे चाहिए कि लोग लगातार काम करें, लगातार खरीदें, और कभी सवाल न करें। इसलिए हमें बताया जाता है कि अगर हम गरीब हैं तो यह हमारी गलती है – हम पर्याप्त मेहनत नहीं करते, हममें टैलेंट नहीं है, हम स्मार्ट नहीं हैं।

लेकिन सच यह है कि एक मजदूर दिन में 12 घंटे काम करता है और फिर भी मुश्किल से अपने परिवार का पेट भर पाता है। जबकि एक मालिक गोल्फ खेलते रहता है और करोड़ों कमाता है। यह मेहनत का फर्क नहीं है, यह व्यवस्था का फर्क है।

आईने को पलटना
तो फिर सवाल उठता है – हम क्या करें? कैसे समझें कि कौन सा विचार हमारा अपना है और कौन सा विचार थोपा गया है?
पहला कदम है – पूछना। हर बात पर सवाल करना। जब कोई कहे कि गरीबी भाग्य की बात है, तो पूछिए कि यह भेदभावपूर्ण भाग्य किसने लिखा है? जब कोई कहे कि अमीर इसलिए अमीर हैं क्योंकि वे होशियार हैं, तो पूछिए कि होशियारी का फायदा सिर्फ उन्हें ही क्यों मिलता है जिनके पास पहले से पूँजी है?
दूसरा कदम है – देखना। अपने आसपास देखिए। कौन काम कर रहा है और कौन आराम कर रहा है? किसके हाथ खुरदुरे हैं और किसके नाखून चमक रहे हैं? कौन रोटी बना रहा है और कौन दावत उड़ा रहा है?
तीसरा कदम है – जुड़ना। अकेले में कोई भी व्यक्ति कमजोर होता है, हमेशा। लेकिन जब लोग एक साथ आते हैं, तो वे ताकतवर बन जाते हैं। इतिहास गवाह है कि हर बड़ा बदलाव सामूहिक संघर्ष से ही आया है।

नया सवेरा संभव है
कुछ लोग कहेंगे कि यह सब बकवास है, दुनिया ऐसी ही है, कुछ बदल नहीं सकता। लेकिन इतिहास उन्हें झुठलाता है। दासता खत्म हुई। सामंतवाद खत्म हुआ। राजशाही खत्म हुई। हर बार लोगों ने कहा था कि यह असंभव है। लेकिन हर बार असंभव संभव हो गया।

आज भी दुनिया बदल सकती है। लेकिन इसके लिए सबसे पहले हमें अपने विचारों को बदलना होगा। हमें यह समझना होगा कि जो विचार हमारे दिमाग में हैं, वे आख़िर कहाँ से आए हैं। हमें यह पहचानना ही होगा कि प्रभुत्वशाली विचार हमेशा सत्ताधारी वर्ग के उनके अपने हित साधने वाले विचार होते हैं।

और सबसे महत्वपूर्ण – हमें यह विश्वास करना होगा कि दूसरी दुनिया संभव है। एक ऐसी दुनिया जहाँ इंसान का शोषण नहीं होगा। जहाँ मेहनत का फल मेहनतकश को मिलेगा। जहाँ किसी बच्चे को भूखा नहीं सोना पड़ेगा सिर्फ इसलिए कि वह गलत घर में याने कि गरीब घर में पैदा हुआ।
यह सपना नहीं, यह संभावना है। इतिहास की धारा इसी ओर बह रही है। बस हमें उस धारा के साथ तैरना सीखना है, उसके खिलाफ नहीं।

आखिरी बात
याद रखिए, हर महान सत्य शुरू में पागलपन लगता है। हर क्रांति शुरू में असंभव लगती है। लेकिन जब लोग जाग जाते हैं, जब वे अपनी ताकत पहचान लेते हैं, और चल पड़ते हैं, तो पहाड़ भी हिल जाते हैं। तो अगली बार जब कोई आपसे कहे कि गरीब होना आपकी गलती है, या अमीरों को और अमीर होना चाहिए, या दुनिया नहीं बदल सकती – तो रुकिए। सोचिए। पूछिए – यह विचार किसके हित में है? और यह विचार किसे फायदा पहुँचाता है?
क्योंकि जिस दिन हम यह समझ गए, उस दिन से बदलाव की शुरुआत हो जाएगी। जिस दिन हम अपने दिमाग से उन प्रभुत्वशाली वर्ग के विचारों को निकाल फेंकेंगे, उस दिन हम सच में आजाद हो जाएंगे।

और तब एक नई दुनिया का सूरज उगेगा – जहां हर इंसान बराबर होगा, हर इंसान सम्मान के साथ जिएगा, हर इंसान अपनी पूरी क्षमता के साथ खिल सकेगा। यही है वह सपना जिसके लिए हमें लड़ना होता है। यही है वह सच जो हमें दिखना चाहिए। क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,
शुभकामनाएं!

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