इतिहास गवाह है कि दुनिया को बदलने वाले अक्सर महलों में नहीं, बल्कि संघर्षों की आग में तपकर निकलते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार का हालिया आलेख ईसा मसीह (जीसस) के जीवन को एक नए नजरिए से पेश करता है। यह नजरिया केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि एक ऐसे क्रांतिकारी (कामरेड) का है, जिसने सत्ता के अहंकार को चुनौती दी और शोषितों के हक में अपनी जान तक कुर्बान कर दी। जीसस का जीवन हमें बताता है कि असली धर्म बदला लेना नहीं, बल्कि खुद को मिटाकर दूसरों को जीवन देना है।
बदले की आग पर करुणा की बारिश
पुराने धार्मिक नियमों में न्याय की परिभाषा ‘दांत के बदले दांत और आंख के बदले आंख’ तक सीमित थी। यह एक अंतहीन हिंसा का चक्र था। जीसस ने पहली बार इस पर पूर्णविराम लगाया। उन्होंने कहा, “अगर कोई तुम्हारे एक गाल पर तमाचा मारे, तो दूसरा गाल भी आगे कर दो।” यह कायरता नहीं, बल्कि आत्मबल की पराकाष्ठा थी। उन्होंने सिखाया कि अगर कोई तुमसे तुम्हारी कमीज़ मांगे, तो उसे अपना कोट भी दे दो। यह दर्शन केवल त्याग का नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को सर्वोच्च स्थान देने का था।
अमीरी और शोषण के खिलाफ खुला विद्रोह
जीसस ने अमीरी और स्वर्ग के रिश्ते पर जो कहा, वह आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था, “सूई के छेद से ऊंट का निकलना संभव है, लेकिन एक अमीर का स्वर्ग में प्रवेश असंभव है।” यह बयान पूंजी के अहंकार पर सीधा प्रहार था।
उनके जीवन का सबसे उग्र रूप तब देखने को मिला जब उन्होंने मंदिर परिसर को ब्याजखोरों और साहूकारों का अड्डा बनते देखा। गरीबों का खून चूसने वाले इन साहूकारों पर जीसस कोड़े लेकर टूट पड़े थे। उन्होंने न केवल उन्हें वहां से खदेड़ा, बल्कि उनकी मेजें भी उलट दीं। यह घटना साबित करती है कि जीसस अन्याय के खिलाफ मौन रहने वाले संत नहीं, बल्कि शोषितों की आवाज बनने वाले योद्धा थे।
पाखंड पर चोट और मानवीय संवेदना
समाज की नैतिकता अक्सर महिलाओं के लिए कठोर और पुरुषों के लिए सुविधाजनक रही है। जब एक भीड़ एक महिला पर व्यभिचार का आरोप लगाकर उसे पत्थरों से मारने के लिए जमा हुई, तो जीसस उनके और उस अबला के बीच दीवार बनकर खड़े हो गए। उन्होंने भीड़ को चुनौती दी, “पहला पत्थर वह मारे जिसने कभी पाप न किया हो।” इस एक वाक्य ने भीड़ के हाथ रोक दिए और उस महिला को नया जीवन मिला। यह घटना बताती है कि न्याय का आधार सजा नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण होना चाहिए।
सलीब पर चढ़ा एक ‘मेहनतकश’
जीसस को सच बोलने की कीमत चुकानी पड़ी। तत्कालीन सत्ता ने उन्हें अपना सलीब (क्रॉस) खुद ढोने पर मजबूर किया। उन्हें ‘राजा’ कहकर चिढ़ाया गया, लेकिन ताज के नाम पर उनके सिर पर कांटों की टहनी बांध दी गई। अंत में, दो चोरों के बीच उन्हें कीलों से ठोक दिया गया।
हिमांशु कुमार लिखते हैं कि जीसस एक मेहनतकश की तरह पैदा हुए, उसी तरह जिए और अंत में उसी तरह अकेले मर गए। उनका जीवन उन करोड़ों मजदूरों और वंचितों का प्रतिबिंब है जो व्यवस्था के बोझ तले दबकर दम तोड़ देते हैं।
एक मानवीय विरासत
जीसस का जीवन किसी चमत्कार से कम नहीं, लेकिन वह चमत्कार पानी को शराब बनाने में नहीं, बल्कि नफरत को प्रेम में बदलने में था। आज जब दुनिया फिर से हिंसा और प्रतिशोध की आग में जल रही है, हमें उस कॉमरेड जीसस’ को याद करने की जरूरत है जो शोषितों के साथ खड़ा था।
जीसस को सिर्फ एक ईश्वर मानना उन्हें सीमित करना होगा; वे मानवता के वो रक्षक थे जिन्होंने सिखाया कि प्रेम ही सबसे बड़ा विद्रोह है। उस मेहनतकश मसीहा को हमारा ‘लाल सलाम’, जिसने इंसानियत के लिए अपनी आखिरी सांस तक संघर्ष किया।





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