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गुरूवार, फ़रवरी 12, 2026
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आधुनिक गुलामी का सच: कैसे पूंजीवाद ने आज़ादी को एक भ्रम बना दिया

दिखती आज़ादी, छुपी हुई गुलामी: पूंजीवाद के इस कॉर्पोरेटी युग में मनुष्य की सच्ची स्थिति

हम जिस दौर में जी रहे हैं, उसे अक्सर आज़ादी, विकास और प्रगति का युग कहा जाता है। कहा जाता है कि आज का मनुष्य पहले से ज़्यादा स्वतंत्र है—वह अपनी नौकरी चुन सकता है, अपने विचार रख सकता है, अपनी ज़िंदगी के फैसले खुद ले सकता है। लेकिन ज़रा ठहरकर सोचिए – क्या यह आज़ादी सच में वास्तविक है, या केवल एक आकर्षक आवरण? क्या आज का मनुष्य सचमुच स्वतंत्र है, या वह किसी ऐसी गुलामी में जकड़ा है, जो बेड़ियों की तरह दिखाई नहीं देती?

यहीं से शुरू होती है आधुनिक पूंजीवादी गुलामी की कहानी – एक ऐसी गुलामी जो चाबुक से नहीं, बल्कि वेतन से चलती है; जो ज़ंजीरों से नहीं, बल्कि कर्ज़, डर और असुरक्षा से मनुष्य को बांधती है।

पुरानी गुलामी और नई गुलामी में फर्क क्या है?
इतिहास की गुलामी साफ़ दिखाई देती थी। गुलामों को खरीदा-बेचा जाता था, उनके शरीर पर मालिक का अधिकार होता था। लेकिन आज की गुलामी उससे कहीं ज़्यादा चालाक है। आज का मज़दूर “कानूनी रूप से स्वतंत्र” है – वह किसी का निजी गुलाम नहीं है। फिर भी उसे हर सुबह उठकर काम पर जाना ही है, चाहे उसका शरीर जवाब दे रहा हो या उसका मन टूट चुका हो।

🔹आज गुलामी का नाम है – रोज़गार।
🔹आज मालिक का नाम है – कंपनी, कॉरपोरेशन, बाज़ार।

और आज की ज़ंजीरें हैं – भूख, बेरोज़गारी का डर, कर्ज़ और असुरक्षित भविष्य।
यही वह बिंदु है जहाँ कार्ल मार्क्स की सोच असाधारण रूप से प्रासंगिक हो जाती है।

पूंजी: एक अदृश्य लेकिन सर्वशक्तिमान ताकत
मार्क्स ने कहा था – पूंजी कोई वस्तु नहीं, बल्कि एक सामाजिक संबंध है।
यह वह संबंध है जिसमें कुछ लोगों के पास उत्पादन के साधन होते हैं – ज़मीन, कारख़ाने, मशीनें, तकनीक – और बाकी लोगों के पास केवल उनका श्रम।

पूंजी का कोई धर्म नहीं, कोई जाति नहीं, कोई राष्ट्र नहीं। वह केवल मुनाफ़ा पहचानती है। इसलिए भारत का मज़दूर, अफ्रीका का किसान, यूरोप का फैक्ट्री वर्कर और अमेरिका का डिलीवरी बॉय – सब एक ही तंत्र में पिसते हैं। भाषा अलग है, चेहरा अलग है, लेकिन शोषण का तर्क एक ही है। काम ज़्यादा। मज़दूरी कम।
और मुनाफ़ा – ऊपर बैठे कुछ लोगों के लिए।

मज़दूरी की गुलामी: सबसे सभ्य शोषण
मार्क्स ने इस व्यवस्था को “मज़दूरी की गुलामी” कहा।
क्योंकि यहाँ मनुष्य को खरीदा नहीं जाता, बल्कि उसकी श्रम-शक्ति खरीदी जाती है।

एक मज़दूर दिनभर काम करता है। वह जितना मूल्य पैदा करता है, उसका एक छोटा हिस्सा उसे वेतन के रूप में मिल जाता है। बाकी मूल्य – जिसे मार्क्स ने अधिशेष मूल्य (सरप्लस वैल्यू) कहा – पूंजीपति की जेब में चला जाता है। यही शोषण की जड़ है।

इस गुलामी की सबसे बड़ी क्रूरता यह है कि इसमें शोषित को लगता है कि वह स्वतंत्र है। वह अपने शोषण को अपनी किस्मत, अपनी मेहनत या अपनी असफलता मान लेता है। व्यवस्था पर सवाल उठाने की जगह वह खुद को दोषी मानने लगता है।

वैश्वीकरण: गुलामी का अंतरराष्ट्रीयकरण
आज पूंजी एक देश तक सीमित नहीं है। वह सीमाओं से मुक्त है। अगर कहीं मज़दूर सस्ता नहीं मिलता, तो पूंजी अपना सामान समेटकर दूसरे देश चली जाती है। यही वजह है कि सरकारें श्रमिक अधिकारों को कमजोर करती हैं, न्यूनतम मज़दूरी दबाती हैं और सामाजिक सुरक्षा घटाती हैं—ताकि पूंजी “नाराज़” न हो जाए।

इस प्रतिस्पर्धा में मज़दूर हर जगह हारता है।
यही कारण है कि आधुनिक गुलामी पूरी दुनिया में एक जैसी दिखती है।

धर्म, राष्ट्र और पहचान: असली मुद्दे से ध्यान हटाने के औज़ार
मार्क्स समझते थे कि शोषण केवल आर्थिक नहीं होता, वह वैचारिक भी होता है।
जब मज़दूर अपने शोषण को समझने लगता है, तब व्यवस्था उसे किसी और झगड़े में उलझा देती है – धर्म, जाति, राष्ट्र, भाषा।

मज़दूर मालिक से नहीं, बल्कि मज़दूर मज़दूर से लड़ने लगता है।
और पूंजी – खामोशी से मुनाफ़ा कमाती रहती है।

मार्क्स का समाधान: सुधार नहीं, परिवर्तन
मार्क्स किसी दया, किसी सुधार या किसी नैतिक अपील के पक्ष में नहीं थे। वे जानते थे कि शोषण की जड़ व्यवस्था में है, व्यक्तियों में नहीं।
उनका समाधान स्पष्ट था – उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व का अंत।
जब तक कुछ लोग उत्पादन पर मालिक बने रहेंगे, तब तक बहुसंख्यक लोग शोषित बने रहेंगे।
श्रमिक वर्ग की सत्ता।
जो समाज का वास्तविक निर्माता है, वही समाज का निर्णयकर्ता बने।
समाजवादी व्यवस्था।
जहाँ उत्पादन मुनाफ़े के लिए नहीं, बल्कि मानवीय ज़रूरतों के लिए हो।
अंतरराष्ट्रीय एकता।
क्योंकि पूंजी वैश्विक है, इसलिए मुक्ति भी वैश्विक होगी।

क्या यह सपना है?
इन विचारों को अक्सर “अव्यावहारिक” कहा जाता है। लेकिन क्या यह ज़्यादा व्यावहारिक है कि अरबों लोग गरीबी, असुरक्षा और तनाव में जिएँ, जबकि मुट्ठीभर लोग अकूत संपत्ति पर बैठे रहें?
मार्क्स ने कोई स्वर्ग का सपना नहीं दिखाया। उन्होंने केवल यह कहा कि जिस व्यवस्था को मनुष्य ने बनाया है, उसे मनुष्य बदल भी सकता है।

(Author)

सवाल से शुरू होती है आज़ादी
सच्ची आज़ादी बंदूक से नहीं आती।
सच्ची आज़ादी सवाल से शुरू होती है।
जब एक मज़दूर पूछता है – मेरी मेहनत का पूरा फल कहाँ गया?
जब एक युवा पूछता है – काम के बावजूद भविष्य इतना असुरक्षित क्यों है?
जब समाज पूछता है – विकास किसके लिए है?
यहीं से पूंजी की आधुनिक गुलामी की दीवारें दरकने लगती हैं।
आज़ादी कोई उपहार नहीं, बल्कि एक संघर्ष है।
और यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा, जब तक मनुष्य मनुष्य का शोषण करता रहेगा।

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