रायपुर (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ के औद्योगिक क्षेत्र खरोरा (रायखेड़ा-चिचोली) में स्थित ‘अडानी पावर एंड स्टील कंपनी’ के भीतर गहराता असंतोष अब सड़कों पर सैलाब बनकर उमड़ पड़ा है। अपनी 16 सूत्रीय जायज मांगों को लेकर पिछले 11 दिनों से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठे 1800 श्रमिकों ने शुक्रवार को एक विशाल महारैली निकालकर प्रबंधन और प्रशासन के खिलाफ अपने आक्रोश का शंखनाद किया।
हक की लड़ाई और प्रबंधन की हठधर्मिता
गौरतलब है कि ‘पावर एवं स्टील श्रमिक संघ’ के बैनर तले यह आंदोलन 8 दिसंबर से जारी है। विडंबना यह है कि सहायक श्रमायुक्त की मध्यस्थता में हुई कई दौर की वार्ता के बाद प्रशासन ने श्रमिकों की 14 मांगों पर सहमति जता दी थी, लेकिन कंपनी प्रबंधन के अड़ियल रवैये के कारण गतिरोध बरकरार है। प्रबंधन द्वारा मांगों को लागू न किए जाने से क्षुब्ध श्रमिक कड़ाके की ठंड में भी डटे हुए हैं।

दबाव की राजनीति ने फूंकी आंदोलन में जान
बीते 11 दिनों से शांतिपूर्ण ढंग से चल रहे इस धरने को तब नया मोड़ मिला, जब प्रशासन ने इसे ‘अवैध’ करार देते हुए श्रमिकों पर धरना स्थल (पंडाल) हटाने का दबाव बनाया। प्रशासन की इस कार्रवाई ने आग में घी डालने का काम किया। इसके विरोध में आज श्रमिकों ने खरोरा-तिल्दा मुख्य मार्ग पर ‘गैतरा मोड़’ से ‘मूरा मोड़’ तक एक विशाल महारैली निकाली। इस प्रदर्शन के कारण घंटों तक आवागमन बाधित रहा और सड़क पर आक्रोश का माहौल बना रहा।

जनता का मिला अभूतपूर्व समर्थन
इस संघर्ष में अब श्रमिक अकेले नहीं हैं। महारैली में आल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस (ऐक्टू) और छत्तीसगढ़ किसान महासभा के कार्यकर्ताओं समेत रायखेड़ा, चिचोली, गैतरा, और ताराशिव जैसे दर्जनों गांवों के ग्रामीण, किसान और बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हुईं।
धरना स्थल पर आयोजित आक्रोश सभा को संबोधित करते हुए वरिष्ठ मजदूर नेता राजूलाल श्रेष्ठ और ऐक्टू के प्रदेश उपाध्यक्ष नरोत्तम शर्मा ने दो टूक कहा कि प्रबंधन को अपना तानाशाही रवैया छोड़ना होगा। जिला पंचायत सभापति स्वाति वर्मा और पूर्व जनपद अध्यक्ष देवव्रत नायक सहित स्थानीय सरपंचों ने भी एक सुर में श्रमिकों की मांगों को वाजिब ठहराते हुए औद्योगिक शांति के लिए प्रबंधन को जिम्मेदार ठहराया।
संकल्प: मांग पूरी होने तक पीछे नहीं हटेंगे
सभा के अंत में उपस्थित जनसमुदाय और जनप्रतिनिधियों ने सामूहिक संकल्प लिया कि जब तक कंपनी प्रबंधन 16 सूत्रीय मांगों को पूर्णतः स्वीकार नहीं कर लेता, तब तक यह आंदोलन और तेज किया जाएगा। श्रमिकों का स्पष्ट कहना है कि वे सौहार्दपूर्ण वातावरण चाहते हैं, लेकिन अपने अधिकारों की बलि देकर नहीं।
यह आंदोलन केवल 1800 परिवारों की रोजी-रोटी का सवाल नहीं है, बल्कि यह औद्योगिक विकास और मानवीय अधिकारों के बीच संतुलन की एक बड़ी परीक्षा है। प्रशासन को चाहिए कि वह दबाव बनाने के बजाय न्यायोचित समाधान की राह निकाले।





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