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मंगलवार, जनवरी 27, 2026
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समान कार्य के समान वेतन पाना श्रमिकों का अधिकार: जिला न्यायाधीश कोरबा

समान कार्य के लिए समान वेतन: श्रमिकों के अधिकार पर विधिक जागरूकता शिविर

कोरबा (पब्लिक फोरम)। 01 मई 2024 को अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस के अवसर पर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ताप विद्युत कंपनी कोरबा में श्रमिकों की कल्याणकारी योजनाओं के बारे में जानकारी देने के प्रयोजनार्थ एक विधिक जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया। उक्त अवसर पर मुख्य अतिथि श्री सत्येन्द्र कुमार साहू, जिला न्यायाधीश एवं अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, कोरबा ने अपने उद्बोधन में कहा कि जो भी व्यक्ति संस्थान, विभाग एवं अन्य जगहों पर कार्य करता है, वह श्रमिक है। कोई शारीरिक मेहनत करता है तो कोई बौद्धिक (मानसिक) मेहनत करता है, इसलिए हम भी अलग नहीं हैं। माननीय उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय सभी व्यक्तियों के अधिकारों की चिंता करते हैं। किसी भी व्यक्ति के अधिकारों का हनन न हो, इसलिए प्रत्येक विशेष दिवस पर उन्हें कानूनी रूप से जागरूक करने के लिए विधिक जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। यहां आने का मुख्य उद्देश्य यही है कि हम श्रमिकों को उनके अधिकारों के बारे में बता सकें। कानून के समक्ष पुरुष और महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन का अधिकार दिया गया है। साथ ही बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 के अनुसार 14 वर्ष से कम उम्र के किसी बच्चे को किसी कारखाने, दुकानों इत्यादि जगहों पर काम पर नहीं लगाया जा सकता है अथवा उसे किसी अन्य जोखिमपूर्ण रोजगार में नियुक्त नहीं किया जा सकता है।

श्रीमती गरिमा शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि वे अपर जिला एवं सत्र न्यायालय के साथ-साथ श्रम न्यायालय के भी कार्य देखती हैं, इसलिए श्रमिकों से उनका दिल से जुड़ाव है। माननीय उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में पहले 18वीं शताब्दी में श्रमिकों को 16 से 18 घंटे कार्य करवाया जाता था। कभी-कभी उन्हें किसी दिन की मजदूरी भी नहीं दी जाती थी। श्रमिकों द्वारा एक श्रमिक यूनियन बनाई गई। उनके प्रयासों से आगे चलकर 8 घंटे का कार्य दिवस निर्धारित किया गया तथा अतिरिक्त कार्य के लिए अतिरिक्त भुगतान करने का प्रावधान शुरू करवाया गया। कंपनी की जिम्मेदारी होती है कि कार्य करने वाले श्रमिकों को मूलभूत सुविधाएं जैसे सफाई, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की सुविधा उपलब्ध कराई जाए। कार्य के दौरान यदि किसी भी प्रकार की जनहानि/क्षति होती है या सुरक्षा उपकरण न देकर कार्य करवाने पर क्षति होती है तो श्रमिक को मुआवजा देना संबंधित कंपनी की जिम्मेदारी है। ऐसी घटना घटित होने पर सबसे पहले कंपनी के मालिक या अधिकारी को लिखित में सूचना दी जानी चाहिए। उनके द्वारा अभ्यावेदन निरस्त होने पर न्यायालय की शरण ली जा सकती है। 

कुमारी डिम्पल, सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, कोरबा ने कानूनी जानकारी देते हुए कहा कि देश की प्रगति में श्रमिकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सभी कानूनों की उत्पत्ति भारतीय संविधान से होती है। श्रमिकों के अधिकारों का उल्लेख संविधान में किया गया है।

उक्त अवसर पर श्री हेमंत कुमार सचदेव, कार्यपालक निरदेशक, डीसीपीएम कोरबा, संजीव कंशल, अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी, श्रीमती राजेश्वरी रावत, अतिरिक्त मुख्य अभियंता, श्रीमती सरोज राठौर, प्रांतीय संगठन सचिव, फेडरेशन कोरबा, श्री घनश्याम साहू, जोनल सचिव, फेडरेशन कोरबा, अहमद खान एवं उपेन्द्र राठौर, पीएलवी उपस्थित थे।

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