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‘स्त्री’ एक कविता

स्त्री – केवल एक शब्द नहीं,
प्रेम की अथाह गहराई है,
त्याग की अनुपम प्रतिमा,
करुणा की सजीव परछाई है।
वह स्नेह की सरिता अविरल,
परम चेतना की शक्ति महान,
कोमल भावों से भीगी संवेदना,
ममता से धड़कता उसका मन-प्राण।

धरती-सा धैर्य धारण करती,
गगन-सा जिसका विस्तार,
आँचल में जग को समेटे,
सह लेती हर पीड़ा अपार।
अश्रुओं को दीप बना देती,
वेदना को मुस्कान में ढाल,
सूने आँगन में रंग भरती,
सपनों को देती नव उछाल।

कभी माँ बन शीतल छाया,
कभी बहन-सा निर्मल स्नेह,
संगिनी बन जीवन-पथ पर,
साझा करती हर सुख-दुःख।
बेटी बन घर की धड़कन,
हँसी से भर दे हर द्वार,
विपदा में दुर्गा-सी प्रखर,
अन्याय पर ज्वाला-सी हुंकार।

करुणा में गंगा-सी पावन,
साहस में पर्वत-सी अडिग,
संघर्षों में दीपक बनकर,
कर दे अंधकार को निर्जीव।
स्त्री ही सृष्टि का मूल स्वर,
उसी से जीवन साकार,
उसके बिना यह जग सूना,
वह प्रकृति का अनुपम उपहार।    (आलेख: हेमलता जायसवाल)

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