फिर भड़के वरिष्ठ आदिवासी नेता ननकी राम कंवर
रायपुर/कोरबा (पब्लिक फोरम)। कोरबा में जिला खनिज संस्थान न्यास (डीएमएफ) की राशि के उपयोग को लेकर एक बार फिर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। मामला दर्री के ध्यानचंद चौक से परसाभाठा के बजरंग चौक तक बनने वाली सड़क का है, जिसे लेकर केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन आमने-सामने आ गए हैं। आरोप है कि जिस सड़क का निर्माण बालको प्रबंधन को अपनी सीएसआर (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) मद से कराना चाहिए था, उसे जनता के हक के डीएमएफ फंड से बनवाया जा रहा है। इस ‘मनमानी’ पर केंद्र सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव से जवाब तलब किया है। यह मामला सिर्फ एक सड़क का नहीं, बल्कि सिस्टम की उस जिद का है, जो नियमों को ताक पर रखकर फैसलों को अंजाम देती है।

भाजपा के वरिष्ठ आदिवासी नेता और पूर्व गृहमंत्री ननकी राम कंवर ने इस मामले को प्रमुखता से उठाया है। उनकी शिकायत के मुताबिक, दर्री डेम से परसाभाठा तक की सड़क का मुख्य उपयोग बालको कंपनी के लिए होता है। नियमानुसार, इस सड़क का निर्माण बालको को अपने खर्च (सीएसआर) पर करना चाहिए था। लेकिन जिला प्रशासन ने इसे डीएमएफ मद से स्वीकृत कर दिया और लगभग 26 करोड़ रुपए का टेंडर भी जारी कर दिया।
हैरानी की बात यह है कि केंद्र सरकार के खान मंत्रालय ने इस मामले में पहले भी राज्य सरकार को चेताया था, लेकिन उन पत्रों को दरकिनार कर टेंडर प्रक्रिया पूरी की जा रही है।

केन्द्र के आदेशों की लगातार अनदेखी
यह प्रशासनिक लापरवाही का एक बड़ा उदाहरण है। ननकी राम कंवर की शिकायत पर केंद्र सरकार ने कई बार राज्य सरकार का दरवाजा खटखटाया है:-
🔹18 अगस्त 2025: भारत सरकार के खान मंत्रालय ने पहली बार मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया।
🔹24 नवंबर 2025: कार्रवाई न होने पर दूसरा स्मरण पत्र (Reminder) भेजा गया।
🔹04 नवंबर 2025: नोटिसों के बावजूद, लोक निर्माण विभाग (PWD) ने 2.84 किलोमीटर लंबी सड़क के लिए 25.98 करोड़ रुपए का टेंडर (ID: 178632) जारी कर दिया।
🔹13 जनवरी 2026: अब खान मंत्रालय के अवर सचिव ने मुख्य सचिव विकासशील को पुनः पत्र लिखकर नाराजगी जताई है और एमएमडीआर एक्ट के तहत कार्रवाई कर रिपोर्ट मांगी है।
जनता के पैसे पर डाका क्यों?
डीएमएफ का पैसा खनन प्रभावित क्षेत्रों के उन गरीब आदिवासियों और स्थानीय लोगों के लिए होता है, जो प्रदूषण और विस्थापन का दंश झेल रहे हैं। इस फंड का उद्देश्य स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं को बेहतर करना है।
वरिष्ठ नेता ननकी राम कंवर का तर्क भावुक भी है और तार्किक भी – “जब यह सड़क बालको को फायदा पहुंचाने के लिए है, तो इसका बोझ जनता के डीएमएफ फंड पर क्यों डाला जाए? यह सीधे तौर पर खनिज न्यास की राशि का दुरुपयोग और भ्रष्टाचार की नीयत को दर्शाता है।”

अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब केंद्र सरकार जांच के आदेश दे रही है, तो अधिकारी टेंडर प्रक्रिया को इतनी हड़बड़ी में क्यों आगे बढ़ा रहे हैं? क्या किसी विशेष लाभ के चलते नियमों की अनदेखी की जा रही है? ननकी राम कंवर ने मांग की है कि टेंडर को तत्काल निरस्त किया जाए और उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो, जिन्होंने केंद्र के पत्रों के बावजूद टेंडर जारी करने में ‘विशेष रुचि’ दिखाई।
केंद्र सरकार के कड़े रुख के बाद अब गेंद राज्य सरकार के पाले में है। देखना दिलचस्प होगा कि क्या राज्य प्रशासन अपनी गलती सुधारते हुए टेंडर निरस्त करता है और सड़क निर्माण का खर्च बालको से वसूलता है, या फिर केंद्र के पत्रों की अवहेलना का सिलसिला यूं ही जारी रहेगा। बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि जब सिस्टम अपनी मनमानी पर उतर आता है, तो जनता के हक की लड़ाई लड़ना कितना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।





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