समाज के किसी भी कोने में चले जाइए, हर व्यक्ति भ्रष्टाचार, बेईमानी और रिश्वतखोरी का रोना रोता मिल जाएगा। लेकिन इस सामूहिक विलाप के पीछे एक डरावना सच छिपा है- वह यह कि हम उस बीमारी की शिकायत कर रहे हैं जिसके वाहक हम खुद हैं। “हम सब चोर हैं” यह केवल एक उत्तेजक वाक्य नहीं है, बल्कि हमारे वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक चरित्र का नग्न चित्रण है। जब नैतिकता केवल दूसरों को आंकने का पैमाना बन जाए और खुद की बारी आने पर हम ‘सुविधा’ को चुनें, तो समाज का स्वरूप वैसा ही हो जाता है जैसा आज भारत का है।
चुनावी रिश्वतखोरी: जहाँ से ‘चोरी’ शुरू होती है
हमारे लोकतंत्र की नींव ही उस ‘रिश्वत’ पर टिकी है जिसे हम ‘चुनावी वादे’ या ‘मुफ्तखोरी’ कहते हैं।
🔹वोटर का लालच: वोटर आज नीतियों पर नहीं, बल्कि इस आधार पर वोट देता है कि कौन सा दल उसे बिजली, पानी या कैश मुफ्त देगा। Centre for Media Studies (CMS) के अनुसार, 2019 के चुनाव में लगभग 60,000 करोड़ रुपये खर्च हुए। यह पैसा कहां से आया? यह उस भ्रष्टाचार की ‘सीड मनी’ है जिसकी फसल नेता जीतने के बाद काटते हैं।
🔹सत्ता का सौदा: जब एक उम्मीदवार टिकट पाने के लिए पार्टी को पैसा देता है और वोट पाने के लिए जनता को शराब और नकद बांटता है, तो वह ‘जनसेवक’ नहीं, बल्कि एक ‘निवेशक’ होता है। जो सत्ता रिश्वत देकर हासिल की गई हो, वह ईमानदारी से कैसे चल सकती है?
अवसरवादी ईमानदारी: सुविधा का मुखौटा
यह अवधारणा आज एक वैश्विक सत्य बन चुकी है कि समाज में वही ईमानदार है जिसे बेईमानी करने का मौका नहीं मिलता।
🔹शॉर्टकट की संस्कृति: हम वह समाज हैं जो ट्रैफिक सिग्नल पर खड़ा होकर देश सुधारने की बात करता है, लेकिन पकड़े जाने पर 100 रुपये देकर भागने की कोशिश करता है।
🔹आर्थिक चोरी: Transparency International के आंकड़ों के अनुसार, भारत में आज भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो टैक्स चोरी को अपना अधिकार समझता है। रसीद न लेकर कुछ रुपये बचाना हमारी राष्ट्रीय आदत बन चुकी है। हम ‘चोर’ इसलिए हैं क्योंकि हमने बेईमानी को “स्मार्टनेस” का नाम दे दिया है।
मीडिया: लोकतंत्र के ‘चौथे स्तंभ’ का पतन
मीडिया, जिसका काम सत्ता से सवाल करना था, आज खुद इस भ्रष्टाचार के खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी बन गया है।
🔹बौद्धिक चोरी: न्यूज़ चैनल अब सूचना नहीं, बल्कि प्रोपेगेंडा और मनोरंजन बेच रहे हैं। ‘पेड न्यूज़’ और कॉरपोरेट फंडिंग ने पत्रकारिता की रीढ़ तोड़ दी है।
🔹ध्यान भटकाने का खेल: जब देश को बुनियादी मुद्दों (बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा) पर बात करनी चाहिए, तब मीडिया सांप्रदायिक विमर्श और सनसनीखेज मुद्दों में जनता को उलझाए रखता है। यह जनता के ‘विवेक’ की चोरी है। जब प्रहरी ही सत्ता का दरबारी बन जाए, तो जनता की आवाज कौन उठाएगा?
आने वाली पीढ़ी का विनाश: एक आत्मघाती निवेश
हम अपने बच्चों को विरासत में केवल आलीशान बंगले नहीं, बल्कि एक सड़ चुकी मानसिकता दे रहे हैं।
🔹मेहनत का अपमान: जब बच्चा घर में ‘ऊपरी कमाई’ को सम्मान मिलते देखता है, तो उसके लिए परिश्रम का महत्व खत्म हो जाता है।
🔹नैतिक शून्यता: पेपर लीक, नकल माफिया और सिफारिशी नियुक्तियों ने युवाओं के मन में यह बैठा दिया है कि काबिलियत से ज्यादा ‘सेटिंग’ मायने रखती है। हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो तकनीकी रूप से तो शिक्षित है, लेकिन नैतिक रूप से पूरी तरह खोखली है।
प्रशासनिक और राजनैतिक सांठगांठ
ADR (Association for Democratic Reforms) की रिपोर्ट बताती है कि संसद में बैठने वाले लगभग 40% से अधिक सांसदों पर आपराधिक मामले हैं। लेकिन इन्हें चुनने वाले हम ही हैं। हम धर्म, जाति और लालच के नाम पर अपराधियों को सत्ता सौंपते हैं और फिर उनके भ्रष्ट होने पर आश्चर्य जताते हैं। प्रशासनिक अधिकारी भी इसी समाज से आते हैं; वे देखते हैं कि जब नेता ही निवेश की वसूली कर रहा है, तो उन्हें ‘मलाई’ खाने से कौन रोकेगा?
सुधार की शुरुआत कहां से?
“हम सब चोर हैं” क्योंकि हमने गलत को सहना और खुद गलत करना स्वीकार कर लिया है। सुधार न तो किसी भाषण से आएगा और न ही किसी कानून से। यह एक ‘सांस्कृतिक क्रांति’ की मांग करता है:-
1. वोट की गरिमा: जिस दिन नागरिक ‘मुफ्त की रेवड़ी’ के बजाय अस्पताल और स्कूल के नाम पर वोट देगा, भ्रष्टाचार की कमर टूट जाएगी।
2. सामाजिक बहिष्कार: हमें उन लोगों को सम्मान देना बंद करना होगा जिन्होंने बेईमानी से धन कमाया है।
3. व्यक्तिगत जिम्मेदारी: ईमानदारी की शुरुआत अपने घर के बजट और सड़क के नियमों से करनी होगी।
यदि हमने आज अपना आईना साफ नहीं किया, तो आने वाला इतिहास हमें एक ऐसे समाज के रूप में याद रखेगा जिसने अपने ही हाथों अपने भविष्य की नींव में दीमक लगा दी थी।
(आलेख: प्रदीप शुक्ल)





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