स्वामी विवेकानंद को आज जिस तरह एक संकीर्ण धार्मिक पहचान में समेटने की कोशिश की जा रही है, वह न केवल ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है, बल्कि स्वयं विवेकानंद के विचारों का खुला अपमान भी है। देश के प्रख्यात कम्युनिस्ट नेता भूपेंद्रनाथ दत्ता के भाई स्वामी विवेकानंद क्या वास्तव में हिंदू धर्म के प्रचारक थे? क्या वे हिंदू राष्ट्र की अवधारणा के समर्थक थे? या वे जाति-आधारित हिंदू व्यवस्था के रक्षक थे? इन प्रश्नों का उत्तर विवेकानंद के अपने शब्दों में मौजूद है – और वे उत्तर आज की दक्षिणपंथी व्याख्याओं को पूरी तरह असहज कर देते हैं।
आज की राजनीति में विवेकानंद के नाम का जिस तरह वैचारिक दुरुपयोग हो रहा है, उससे यह भ्रम पैदा किया जाता है कि वे हिंदू धर्म की श्रेष्ठता के प्रवक्ता थे। जबकि उनके समस्त साहित्य का गंभीर अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि विवेकानंद ने कहीं भी हिंदू धर्म को अन्य धर्मों से श्रेष्ठ नहीं ठहराया। इसके उलट, उन्होंने हिंदू समाज की आंतरिक सड़ांध—खासकर जातिवाद और पुरोहितवाद—पर सबसे तीखा प्रहार किया।
अपनी प्रसिद्ध पुस्तिका “जाति, संस्कृति और समाजवाद” में विवेकानंद पुरोहिती व्यवस्था को भारत के लिए “अभिशाप” बताते हैं। वे स्पष्ट शब्दों में लिखते हैं कि ब्राह्मणों और क्षत्रियों द्वारा किए गए अत्याचार अंततः उन्हीं पर ब्याज समेत लौटेंगे। यह कथन किसी सुधारवादी संत का नहीं, बल्कि एक निर्भीक सामाजिक क्रांतिकारी का है।
जातिगत उत्पीड़न पर उनका आक्रोश और भी तीखा हो जाता है जब वे पूछते हैं—क्या वह धर्म, जो गरीब के दुःख को दूर न कर सके, धर्म कहलाने योग्य है? क्या वह व्यवस्था, जो केवल “मुझे मत छुओ” सिखाती है, मनुष्य को देवता बना सकती है? विवेकानंद यहां किसी बाहरी आलोचक की तरह नहीं, बल्कि भीतर से जर्जर हो चुके सामाजिक ढांचे को तोड़ने वाले चिंतक की तरह बोलते हैं।
वे उस समाज की कठोर निंदा करते हैं जहां करोड़ों गरीब भूखे हैं, महुआ के फूल से पेट भरते हैं, और वहीं साधु-पुरोहित तथा ब्राह्मण वर्ग उनके श्रम और पीड़ा पर ऐश करता है। विवेकानंद इसे न तो राष्ट्र मानते हैं, न धर्म—बल्कि इसे “नरक” और “शैतान का नंगा नाच” कहते हैं। ऐसे शब्द किसी धर्म-प्रचारक के नहीं हो सकते।
विवेकानंद जनता से आह्वान करते हैं – “आओ, मनुष्य बनो!” वे पुरोहितों को उन्नति का शत्रु बताते हैं और उनके छल को जड़ से उखाड़ फेंकने की बात करते हैं। उनके अनुसार, जब तक अस्पृश्यता और रसोई के बर्तन को धर्म का केंद्र माना जाएगा, तब तक आध्यात्मिक उन्नति असंभव है।
गरीबों और मजदूरों को वे देश की “रीढ़ की हड्डी” कहते हैं। मेहतर, मजदूर और किसान – यदि एक दिन काम बंद कर दें – तो पूरा समाज ठप पड़ जाएगा। फिर भी वही सबसे अधिक अपमानित और शोषित हैं। विवेकानंद इस अन्याय को “घोर अत्याचार” कहते हैं और सवाल उठाते हैं कि जो भूखे को रोटी नहीं दे सकता, वह मोक्ष कैसे दे सकता है?
उनके शब्दों में यह भी साफ है कि हिंदू धर्म जैसा कोई दूसरा धर्म नहीं, जिसने गरीबों और तथाकथित नीच जातियों का गला इतनी क्रूरता से घोंटा हो। यह कथन आज के उन लोगों के लिए असुविधाजनक है, जो विवेकानंद को जातिवादी व्यवस्था का संरक्षक साबित करना चाहते हैं।
अपनी पुस्तिका “नए भारत का निर्माण” में विवेकानंद ईश्वर को मंदिरों और तीर्थों में नहीं, बल्कि गरीब, दुःखी और दुर्बल मनुष्यों में देखते हैं। वे सवाल करते हैं – गंगा तट पर कुआं खोदने क्यों जाते हो, जब ईश्वर स्वयं भूखे-नंगे लोगों के रूप में सामने खड़ा है?
नए भारत की उनकी कल्पना किसानों की कुटियों, मजदूरों की झोपड़ियों, मछुआरों, मोचियों, मेहतरों, जंगलों और पहाड़ों से निकलती है – न कि सत्ता के गलियारों या धर्म के ठेकेदारों से। यह दृष्टि किसी धार्मिक राष्ट्रवाद की नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय समानता की है।
विवेकानंद स्पष्ट रूप से मानते थे कि जाति-प्रथा वेदांत के विरुद्ध है। उनके अनुसार जाति एक सामाजिक और राजनीतिक रूढ़ि है, जिसे तोड़ने का प्रयास भारत के महान आचार्य करते आए हैं। वे केवल समाज की व्याख्या नहीं करते, बल्कि उसे बदलने की घोषणा करते हैं।
यह ऐतिहासिक तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि जिस वेदांत दर्शन का उपयोग शंकराचार्य ने जाति-आधारित समाज को सुदृढ़ करने के लिए किया, उसी वेदांत को विवेकानंद ने जातिगत उत्पीड़न तोड़ने का हथियार बनाया। “शूद्र शासन” की उनकी अवधारणा वस्तुतः सर्वहारा शासन का भारतीय रूपांतरण है। स्वयं विवेकानंद ने अपने को समाजवादी घोषित किया था।

आज जो लोग विवेकानंद के अनुयायी होने का दावा करते हैं, लेकिन उनके इन क्रांतिकारी विचारों पर मौन साध लेते हैं, उनका वैचारिक खंडन अनिवार्य है। विवेकानंद को समझने का एक ही ईमानदार रास्ता है—उनके शब्दों, उनके संघर्ष और उनके उद्देश्य को संपूर्णता में स्वीकार करना। अन्यथा, विवेकानंद का नाम केवल सत्ता की राजनीति का एक औज़ार बनकर रह जाएगा।
(आलेख: सुख रंजन नंदी)





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