शुक्रवार, फ़रवरी 27, 2026
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मौत के बाद भी ‘दो गज़ ज़मीन’ का इंतज़ार: कांकेर में ‘घर वापसी’ के दबाव में आदिवासी ईसाई महिला के अंतिम संस्कार पर रोक

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की भी उड़ी धज्जियां: 3 दिन से मुर्दाघर में पड़ा है महिला का शव

रायपुर/कांकेर (पब्लिक फोरम)। इंसानियत तब दम तोड़ देती है, जब किसी को मौत के बाद भी सुकून मयस्सर न हो और एक शोक संतप्त परिवार को अपने प्रियजन की अंतिम विदाई के लिए समाज और सिस्टम से भीख मांगनी पड़े। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के अमोदी गांव से एक ऐसा ही विचलित करने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक आदिवासी ईसाई परिवार को उनकी मृत परिजन का अंतिम संस्कार करने से रोक दिया गया है। ‘घर वापसी’ के दबाव और कट्टरपंथी धमकियों के कारण मृतका का शव पिछले कई दिनों से मुर्दाघर में रखा हुआ है, जो मानवीय गरिमा और संवैधानिक अधिकारों का घोर उल्लंघन है।

अस्पताल जाते समय हुई थी मौत, अब मुर्दाघर में है शव
जानकारी के अनुसार, कांकेर जिले की अंतागढ़ तहसील (थाना दुर्गकोंडल) के अमोदी गांव (पांद्रीपुरा) निवासी कमलेश मंडावी की 34 वर्षीय पत्नी संबाई मंडावी का 24 फरवरी 2026 को निधन हो गया। उन्हें सांस और हृदय संबंधी गंभीर समस्या थी और अस्पताल ले जाते समय उन्होंने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। पत्नी के निधन के दुख से टूट चुके कमलेश पर दुखों का असली पहाड़ तब टूटा, जब गांव वालों ने संबाई के शव को सार्वजनिक कब्रिस्तान या कमलेश की अपनी निजी ज़मीन पर भी दफनाने से साफ इनकार कर दिया।

‘घर वापसी’ का दबाव और खौफनाक धमकियां
स्थानीय ग्रामीणों का एक गुट कमलेश मंडावी पर हिंदू धर्म में जबरन धर्मांतरण (जिसे ‘घर वापसी’ कहा जा रहा है) का दबाव बना रहा है। ग्रामीणों ने परिवार को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है। पीड़ित परिवार का आरोप है कि उन्हें शारीरिक हमले और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की धमकियां दी जा रही हैं। हद तो तब पार हो गई जब यह चेतावनी दी गई कि यदि शव दफनाया गया, तो वे उसे कब्र से खोदकर बाहर निकाल देंगे। ग्रामीणों का तर्क है कि ईसाई रीति-रिवाज से शव दफनाने से उनकी ज़मीन और स्थानीय देवी-देवता “अपवित्र” हो जाएंगे।

इस क्रूर सामाजिक बहिष्कार के चलते संबाई मंडावी का शव वर्तमान में दुर्गकोंडल अस्पताल के मुर्दाघर में रखा हुआ है। अपनों को खोने के दुख के साथ-साथ पत्नी को ससम्मान विदा न कर पाने की बेबसी ने कमलेश मंडावी को गहरे भावनात्मक सदमे में डाल दिया है।

कलेक्टर से शिकायत, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना
न्याय की गुहार लगाते हुए कमलेश मंडावी ने कांकेर के जिला कलेक्टर के पास एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें आरोपियों के नाम और उत्पीड़न का पूरा ब्योरा दिया गया है।

इस घटना की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह सुप्रीम कोर्ट के उस स्पष्ट आदेश की खुली नाफरमानी है, जो महज कुछ दिन पहले ही आया है। 18 फरवरी 2026 को ही भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ में शवों को कब्र से निकालने की घटनाओं पर रोक लगाने का अंतरिम आदेश पारित किया था। इसके बावजूद, ऐसी धमकियों का खुलेआम दिया जाना यह दर्शाता है कि उपद्रवी तत्वों में कानून का कोई खौफ नहीं रह गया है। यह स्थिति जमीनी स्तर पर न्यायिक निर्देशों के सख्त पालन की तत्काल मांग करती है।

पीसीए ने की त्वरित हस्तक्षेप की मांग
इस अमानवीय कृत्य पर ‘प्रोग्रेसिव क्रिश्चियन अलायंस’ (PCA) ने कड़ी आपत्ति दर्ज की है। पीसीए ने एक प्रेस नोट जारी कर इस घटना की कड़ी निंदा की है और मंडावी परिवार के साथ एकजुटता जाहिर की है। संगठन ने राज्य सरकार और प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप करने, कमज़ोर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और कानून का शासन स्थापित करते हुए महिला के ससम्मान अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने की अपील की है।

“यह घटना महज़ एक परिवार का उत्पीड़न नहीं है, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर भी सवालिया निशान है, जो हर नागरिक को सम्मान से जीने और सम्मान के साथ इस दुनिया से जाने का हक देता है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में कब तक चुप्पी तोड़ता है और मंडावी परिवार को कब न्याय मिल पाता है।”

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