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बुधवार, फ़रवरी 11, 2026
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वेदांता चेयरमैन का 75 प्रतिशत संपत्ति दान का ऐलान और बालको  के ‘शांति नगर’ का 15 साल पुराना दर्द: क्या यही है असली समाज सेवा?

दान देना निस्संदेह महानता का प्रतीक है, लेकिन जब दान देने वाले हाथों के नीचे ही अंधेरा हो, तो सवाल उठना लाजिमी है। हाल ही में वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने अपनी संपत्ति का 75 प्रतिशत हिस्सा समाज के लिए दान करने की दूसरी बार भावुक घोषणा की है। इस खबर ने निश्चित रूप से पहले की ही तरह फिर से सुर्खियां बटोरीं, लेकिन इन सुर्खियों के पीछे छत्तीसगढ़ के कोरबा स्थित BALCO के ‘शांति नगर’ की 15 साल पुरानी टीस एक कड़वी सच्चाई बयां कर रही है। यह कहानी उन विरोधाभासों की है, जहां एक तरफ तो दुनिया को बदलने के वादे हैं, और दूसरी तरफ अपनी ही कंपनी वेदांता के कारण बर्बाद हुए परिवारों की अनसुनी चीखें।

दानवीरता के शोर में दबी इंसाफ की गुहार
बीते 15 सालों से बालको का ‘शांति नगर’ इलाका, बालको के कूलिंग टॉवर से निकलने वाले दुष्प्रभावों को झेल रहा है। यहाँ के निवासी उस विकास की कीमत चुका रहे हैं, जिसका लाभ मीलों दूर बैठे निवेशकों को मिल रहा है। अनिल अग्रवाल की घोषणा के बाद, यहाँ के निवासियों का दर्द और गहरा हो गया है। उनके लिए यह सिर्फ़ एक खबर नहीं, बल्कि एक क्रूर मजाक जैसा लगता है।
जमीनी हकीकत यह है कि कूलिंग टॉवर की वजह से यहाँ का जीवन नारकीय हो चुका है, लेकिन प्रभावित परिवारों को अब तक न तो पुनर्वास मिला, न मुआवजा और न ही वो रोजगार, जिसका वादा किया गया था।

उदारता बनाम जिम्मेदारी: एक विश्लेषण
इस पूरे मामले को करीब से देखने पर कुछ गंभीर सवाल खड़े होते हैं, जो केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं:-

🔹विस्थापन का दर्द: 15 साल एक लंबा वक्त होता है। यहाँ की कई पीढ़ियां धुएं, शोर और बीमारी के साये में पली-बढ़ी हैं। क्या अरबों की संपत्ति का दान इन लोगों की खोई हुई सेहत और सुकून वापस ला सकता है?
🔹0.1% की दरकार: स्थानीय लोगों का कहना है कि वेदांता अपनी अपार संपत्ति का अगर 0.1% हिस्सा भी उन लोगों के पुनर्वास पर खर्च कर देता, जिनकी जिंदगियां उनके ऑपरेशन्स (कामकाज) से तबाह हुई हैं, तो शायद आज यह नौबत न आती।

छवि सुधार या वास्तविक सेवा? जब अपने ही घर के आंगन (परिचालन क्षेत्र) में लोग बुनियादी अधिकारों के लिए तरस रहे हों, तो वैश्विक स्तर पर दान की घोषणाएं ‘परोपकार’ कम और ‘इमेज मैनेजमेंट’ (छवि सुधारने की कवायद) ज्यादा लगती हैं।

यह मामला उदारता का नहीं, न्याय का है
शांति नगर के निवासियों का संघर्ष किसी भीख या खैरात के लिए नहीं है। यह लड़ाई ‘हक़’ की है। जब कोई कंपनी किसी क्षेत्र में काम करती है, तो वहां के पर्यावरण और समाज के प्रति उसकी पहली जिम्मेदारी बनती है।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है, “असली कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) की परीक्षा पोस्टरों या अखबारों के विज्ञापनों में नहीं होती। इसकी असली परीक्षा जमीन पर होती है, उन लोगों के बीच जिन्होंने आपकी कंपनी की सफलता के लिए अपनी शांति की कुर्बानी दी है।”

पहले घर, फिर दुनियां
वेदांता अध्यक्ष की भावना का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन दान की सार्थकता तभी है जब उसकी शुरुआत उन लोगों से हो जो सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। शांति नगर के लोग आज भी उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं कि शायद दुनिया का भला करने चले ‘वेदांता’ की नजर उनके टूटे हुए आशियानों और बिखरे हुए सपनों पर भी पड़ेगी।
अग्रवाल साहब, समाज सेवा का सबसे बड़ा पाठ यही है कि आप दुनिया को रौशन करने से पहले उस दिये के नीचे का अंधेरा मिटाएं, जो आपकी अपनी बालको के दहलीज पर जल रहा है। जब तक शांति नगर को न्याय नहीं मिलता, तब तक 75 प्रतिशत दान के वादे इन पीड़ितों के लिए महज एक अधूरा सच बनकर रह जाएंगे।

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