कोरबा (पब्लिक फोरम)। कोरबा नगर पालिक निगम के गलियारों में इन दिनों एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई है। यह खामोशी सिर्फ सदन की नहीं, बल्कि शहर के रुके हुए विकास की है। पिछले 7 महीनों से निगम की सामान्य सभा आयोजित नहीं की गई है, जिससे अब लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस लेट लतीफी के खिलाफ नेता प्रतिपक्ष कृपाराम साहू ने कड़ा रुख अपनाते हुए कलेक्टर और निगम सभापति को पत्र लिखा है। उन्होंने इसे नियमों की खुली अनदेखी और जनहित की उपेक्षा करार दिया है।
नियमों का उल्लंघन और जिम्मेदारों की चुप्पी
छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम के पन्ने स्पष्ट कहते हैं कि लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए हर दो महीने में कम से कम एक बार सामान्य सभा का आयोजन अनिवार्य है।
तारीख गवाह है: निगम के रिकॉर्ड बताते हैं कि आखिरी सामान्य सभा 2 मई 2025 को आयोजित की गई थी।
नियमों की बात: अधिनियम के मुताबिक, अब तक 3 से 4 बैठकें हो जानी चाहिए थीं।
वर्तमान स्थिति: 7 महीने बीत जाने के बाद भी अगली बैठक की कोई सुगबुगाहट नहीं है।
नेता प्रतिपक्ष ने अपने पत्र में इस बात पर जोर दिया है कि एक भी बैठक न बुलाया जाना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि यह चुनी हुई लोकतांत्रिक व्यवस्था का अपमान भी है।
आम जनता पर क्या पड़ रहा है असर?
यह मामला सिर्फ फाइलों या नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर कोरबा के आम नागरिकों की जिंदगी पर पड़ रहा है। सामान्य सभा वह मंच होता है, जहाँ शहर की धड़कन सुनी जाती है।
रुका हुआ विकास: सभा न होने से शहर के विकास कार्यों की मंजूरी अटकी पड़ी है।
पार्षदों की बेबसी: जनता द्वारा चुने गए पार्षद अपने वार्ड की समस्याएं, जैसे- बिजली, पानी और सड़क के मुद्दे सदन में नहीं उठा पा रहे हैं।
जनता के सवाल: लोग अपने प्रतिनिधियों से सवाल पूछ रहे हैं, लेकिन सदन बंद होने के कारण समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है।
निगम के नेता प्रतिपक्ष कृपाराम साहू ने लिखा है कि सभा न होने से पार्षदों के अधिकारों का हनन तो हो ही रहा है, साथ ही शहर की जनता भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है।
चेतावनी: अब नहीं तो कब?
नेता प्रतिपक्ष कृपाराम साहू ने अपने पत्र में सिर्फ शिकायत नहीं की है, बल्कि प्रशासन को अल्टीमेटम भी दिया है। उन्होंने निगम सभापति से मांग की है कि नियमों का पालन करते हुए तत्काल सामान्य सभा की तारीख घोषित की जाए। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में साफ कर दिया है कि यदि जल्द ही बैठक नहीं बुलाई गई, तो यह मामला और गंभीर राजनीतिक रूप ले सकता है। विपक्ष अब चुप नहीं बैठेगा।
लोकतंत्र में संवाद ही सबसे बड़ी ताकत होती है। जब सदन खामोश हो जाता है, तो जनता की तकलीफें बढ़ने लगती हैं। अब देखना यह होगा कि नेता प्रतिपक्ष की इस चिट्ठी के बाद निगम प्रशासन की नींद कब टूटती है। क्या जल्द ही कोरबा निगम के सदन में जनहित के मुद्दों की गूंज सुनाई देगी, या फिर राजनीति का यह पारा और चढ़ेगा? फिलहाल, शहर की जनता अपने हक की आवाज उठने का इंतजार कर रही है।





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