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गुरूवार, अप्रैल 3, 2025
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भारत की दो चेहरों वाली कहानी: 80 करोड़ भूखे, 200 अरबपति और माफ हुए उनके लाखों करोड़ के लोन

भारत आज दो अलग-अलग तस्वीरों का देश बन चुका है। एक तरफ मुकेश अंबानी और गौतम अडानी जैसे अरबपतियों की दौलत आसमान छू रही है, तो दूसरी तरफ 80 करोड़ लोग हर महीने सिर्फ 5 किलो मुफ्त राशन पर जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। किसान आत्महत्या कर रहे हैं, मजदूरों की कमाई महंगाई के आगे बेबस है, लेकिन बड़े उद्योगपतियों के हजारों करोड़ रुपये के कर्ज माफ हो रहे हैं। यह कहानी न सिर्फ आर्थिक असमानता की है, बल्कि उस दर्द और उम्मीद की भी है, जो भारत के हर कोने में छिपी है।

80 करोड़ लोगों का दर्द: 5 किलो राशन ही सहारा
आज भारत में गरीबी इस कदर बढ़ गई है कि 80 करोड़ लोगों को सरकार की *प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना* का इंतजार रहता है। हर महीने 5 किलो अनाज उनके लिए जिंदगी का आधार है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इतने से एक परिवार का पेट भर सकता है? 
– NFHS-5 (2021-22) की रिपोर्ट बताती है कि देश के 35% बच्चे कुपोषण का शिकार हैं और 57% महिलाएं खून की कमी से जूझ रही हैं। 
– NSSO (2023) के आंकड़े कहते हैं कि गाँवों में नौकरियाँ कम हुईं, मजदूरी नहीं बढ़ी, लेकिन खाने-पीने की चीजों के दाम 40% तक उछल गए। 
हर दिन भूख और गरीबी से जंग लड़ते इन लोगों की आवाज क्या कभी सुनी जाएगी?

अरबपतियों का सुनहरा दौर: 200 से ज्यादा बिलियनेयर, 75 लाख करोड़ की संपत्ति
दूसरी ओर, भारत में अमीरों की दुनिया चमक रही है। 
– हुरुन रिच लिस्ट 2024 के मुताबिक, देश में 200 से ज्यादा अरबपति हैं, जिनकी कुल दौलत 1 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 75 लाख करोड़ रुपये) से भी ज्यादा है। 
– मुकेश अंबानी (110 बिलियन डॉलर) और गौतम अडानी (100 बिलियन डॉलर) की संपत्ति अकेले देश के 70 करोड़ लोगों की कुल दौलत से ज्यादा है (Oxfam 2024)। 
– पिछले 10 सालों में अरबपतियों की संपत्ति 400% बढ़ी, लेकिन मजदूरों की कमाई में सिर्फ 10-15% की बढ़ोतरी हुई। क्या यह वाकई विकास है, या सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों की चमक?

लोन माफी का खेल: जनता का पैसा, उद्योगपतियों की जेब में
बैंकों के कर्ज माफी का आलम यह है कि आम आदमी का छोटा-सा कर्ज भी माफ नहीं होता, लेकिन बड़े उद्योगपतियों के लाखों करोड़ रुपये आसानी से “माफ” हो जाते हैं। 
– RBI (2023) के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 10 साल में 15 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के खराब कर्ज (NPA) माफ किए गए। 
– इनमें से 2.5 लाख करोड़ रुपये सिर्फ 10 बड़े उद्योगपतियों के थे। 
– विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी जैसे लोग बैंकों का पैसा लेकर फरार हो गए, लेकिन गरीब किसान का 10,000 रुपये का कर्ज भी उसकी जान ले लेता है। 
सवाल उठता है- यह न्याय है या जनता के साथ धोखा?

असमानता की जड़ें: क्यों बढ़ रही है खाई?
(1) नीतियाँ अमीरों के हक में 
– 2019 में कॉरपोरेट टैक्स 30% से घटाकर 22% किया गया, जिससे बड़ी कंपनियों को 1.5 लाख करोड़ रुपये का फायदा हुआ। 
– GST का बोझ छोटे व्यापारियों पर पड़ा, जबकि बड़े कारोबार फलते-फूलते रहे। 

(2) मजदूरों की अनदेखी 
– न्यूनतम मजदूरी कानून लागू नहीं हो रहा। 60% मजदूर 300-400 रुपये रोज पर काम करते हैं। 
– कॉन्ट्रैक्ट नौकरियाँ बढ़ीं, स्थायी रोजगार घटे। 

(3) किसानों का संकट 
– NABARD (2022-23) की रिपोर्ट कहती है कि 86% किसानों की मासिक आय 10,000 रुपये से कम है। 
– NCRB** के आंकड़े बताते हैं कि हर दिन 30 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर रहे हैं। 

रास्ता क्या है? “सपनों के भारत का निर्माण” 
1. अमीरों पर टैक्स: 1% सुपर-रिच पर वेल्थ टैक्स लगाया जाए। 
2. लोन माफी पर लगाम: बैंकों में कर्ज माफी की जवाबदेही तय हो। 
3. मजदूरी बढ़ाएँ: न्यूनतम मजदूरी 600 रुपये रोज की जाए। 
4. राशन बढ़ाएँ: हर परिवार को 5 की जगह 10 किलो राशन मिले। 

विकास का असली मतलब क्या है?
भारत की GDP आज दुनिया में पाँचवें नंबर पर है, लेकिन 80 करोड़ लोग अभी भी भूख और गरीबी से जूझ रहे हैं। अगर 200 से ज्यादा अरबपतियों की दौलत देश के हित में लगे, तो शायद हर बच्चे का पेट भरे, हर किसान की आँखों में आँसू न हों। 
क्या हम ऐसा भारत बना पाएँगे, जहाँ अमीर-गरीब की खाई न हो? या यह सपना सिर्फ कागजों पर रह जाएगा? 
(यह लेख RBI, Oxfam, NSSO, NCRB और हुरुन रिच लिस्ट के तथ्यों पर आधारित है।)
– दिलेश उईके

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