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गुरूवार, जनवरी 22, 2026
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क्रिसमस पर नफरत का साया: ईसाइयों पर हमले, सत्ता की चुप्पी और लोकतंत्र की गिरती साख

आस्था पर पहरा और लोकतंत्र का गिरता चेहरा

“सियासत की ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में जब संविधान खो जाता है, तब नफरत का शोर प्रार्थनाओं से ऊँचा हो जाता है।”

पूरी दुनिया जब शांति और सद्भाव के प्रतीक क्रिसमस के उल्लास में डूबी थी, तब भारत के कई हिस्सों से आती नफरत और हिंसा की तस्वीरें लोकतंत्र के माथे पर कलंक की तरह उभरीं। खुद को धर्म का रक्षक बताने वाले कुछ तत्वों ने न केवल ईसाइयों के प्रार्थना स्थलों को निशाना बनाया, बल्कि भारत के उस ‘साझा चूल्हे’ को भी तोड़ने की कोशिश की, जहाँ हर त्योहार सबका होता था। विडंबना देखिए कि एक ओर प्रधानमंत्री चर्च जाकर अपनी सर्वधर्म समभाव की छवि पेश करते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हीं की विचारधारा के नाम पर सड़कों पर ‘गुंडागर्दी’ का नंगा नाच होता है।

🔹संविधान बनाम कट्टरता: बढ़ती खाई
ओडिशा से लेकर छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश तक, ईसाइयों के खिलाफ हिंसा की बढ़ती घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ‘नया भारत’ केवल एक खास विचारधारा के लिए है? रायपुर के मॉल में तोड़फोड़ हो या बरेली के चर्च में हनुमान चालीसा का ज़बरन पाठ—ये घटनाएं संयोग नहीं, बल्कि उस ध्रुवीकरण का प्रयोग हैं जिसे सत्ता का मौन संरक्षण प्राप्त है। यूनाइटेड क्रिश्चियन फ़ोरम (UCF) के आंकड़े डराने वाले हैं; 2014 से 2024 के बीच ईसाई समुदाय के खिलाफ हिंसा में 500% की वृद्धि महज एक सांख्यिकी नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक ताने-बाने के फटने की गूँज है।

🔹हिंदुत्व, विवेकानंद का हिंदुत्व और आज का उन्माद
आज का ‘हिंदुत्व’ स्वामी विवेकानंद के उस उदात्त विचार से कोसों दूर खड़ा है, जिन्होंने शिकागो में गर्व से कहा था कि उनका धर्म ‘सार्वभौमिक स्वीकृति’ में विश्वास रखता है। विवेकानंद ने तो ईसा मसीह को हृदय के रक्त से पूजने की बात कही थी, लेकिन आज गोलवलकर की ‘बंच ऑफ थॉट्स’ को ढाल बनाकर अल्पसंख्यकों को ‘आंतरिक खतरा’ घोषित किया जा रहा है। सत्ता को यह स्पष्ट करना होगा कि देश संविधान की प्रस्तावना से चलेगा या नफरत की किसी संकीर्ण किताब से।

🔹छवि और हकीकत का द्वंद्व
प्रधानमंत्री मोदी की अंतरराष्ट्रीय छवि एक ‘विश्वगुरु’ की हो सकती है, लेकिन जब देश के भीतर नेत्रहीन महिलाओं के साथ बदसलूकी होती है और गरीबों को सैंटा की टोपी बेचने पर धमकाया जाता है, तब विदेशी दौरों की चमक फीकी पड़ जाती है। कैमरे के सामने चर्च में कैंडल जलाना और कैमरे के पीछे अपने ही कार्यकर्ताओं की हिंसा पर चुप्पी साधना, एक दोहरी नीति है जिसे दुनिया देख रही है।

हिंदू धर्म संस्कृति की रक्षा का जिम्मा धर्मगुरुओं और शंकराचार्यों का है, न कि सत्ता की शह पर पल रहे उन लठैतों का जो अपनी पहचान केवल हिंसा में ढूंढते हैं। यदि सरकार वास्तव में ‘सबका साथ, सबका विकास’ चाहती है, तो उसे इन उन्मादी तत्वों के खिलाफ कठोर संवैधानिक कार्रवाई करनी होगी। लोकतंत्र में धर्म एक व्यक्तिगत चुनाव है, न कि किसी की दया पर निर्भर ‘अनुमति’।

समय आ गया है कि सत्ता तय करे कि वह विवेकानंद के ‘समावेशी भारत’ के साथ खड़ी है या गोलवलकर के ‘विभाजित भारत’ के साथ। क्योंकि इतिहास केवल तस्वीरों को नहीं, बल्कि उन तस्वीरों के पीछे छिपी खामोश चीखों को भी दर्ज करता है।
(आलेख: प्रदीप शुक्ल)

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