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गुरूवार, जनवरी 22, 2026
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एकता की ताकत और जिन्दगी भर का संघर्ष

“जब तिनके बिखर जाते हैं”

एक बूढ़े किसान ने मरते समय अपने तीन बेटों को बुलाया। उसने लकड़ियों का एक गट्ठर उनके सामने रखा और कहा – “इसे तोड़ो।” तीनों ने मिलकर कोशिश की, पर गट्ठर नहीं टूटा। फिर बूढ़े ने गट्ठर खोल दिया और एक-एक लकड़ी अलग कर दी। अब हर लकड़ी आसानी से टूट गई।
बूढ़े ने कहा – “जब तक तुम साथ हो, कोई तुम्हें तोड़ नहीं सकता। लेकिन अगर बिखर गए, तो दुनिया तुम्हें रौंद देगी।”
यह सिर्फ एक पुरानी घिसी-पिटी कहानी नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा सच है।

शोषण का गणित: फूट डालो, राज करो
हमारे चारों ओर देखिए। जहां भी एकता टूटती है, वहीं शोषण का साम्राज्य खड़ा हो जाता है। यह कोई संयोग नहीं, एक सुनियोजित खेल है।
परिवार में देखिए: दो भाइयों में जब तक प्रेम था, संपत्ति सुरक्षित थी। लेकिन जैसे ही किसी बाहरी व्यक्ति ने उनके बीच संदेह का बीज बो दिया, वे अदालतों में भटकने लगे। वकीलों की जेबें भरीं, परिवार बर्बाद हुआ।
समाज में देखिए: जब तक गांव के लोग एकजुट थे, जमींदार मनमानी नहीं कर सकता था। लेकिन जैसे ही उसने जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर, ऊंच-नीच के नाम पर लोगों को बांट दिया, सबकी कमर टूट गई। फिर वह मनचाहा शोषण करने लगा।
कारखानों में देखिए: जब मजदूर संगठित थे, तो मालिक उनकी मांगें मानने को मजबूर था। लेकिन जब मालिक ने कुछ मजदूरों को विशेष सुविधाएं देकर अलग कर दिया, बाकियों को कमजोर बना दिया। फिर सबके अधिकार छीन लिए गए।
सूत्र साफ है: एकता घटी = शोषण बढ़ा।

इतिहास गवाह है
भारत को ही देखिए। सैकड़ों वर्षों तक विदेशी शासन झेला। क्यों? क्योंकि हम बंटे हुए थे। एक राजा दूसरे राजा से लड़ रहा था। एक प्रांत दूसरे प्रांत को शत्रु मान रहा था।
अंग्रेजों ने इसी फूट का फायदा उठाया। उन्होंने “फूट डालो, राज करो” की नीति अपनाई। हिंदू-मुस्लिम, उत्तर-दक्षिण – हर संभव विभाजन की रेखा खींची। और हम लड़ते रहे, वे राज करते रहे। आजादी कैसे मिली? जब सबने एकजुट होकर लड़ाई लड़ी। जब आदिवासी-दलित, किसान मजदूर विद्यार्थी सभी एक मंच पर आए। एकता आई, आजादी आई।

आंतरिक एकता का मतलब क्या है?
बहुत लोग समझते हैं कि एकता का मतलब सिर्फ साथ खड़े होना है। नहीं! आंतरिक एकता कहीं ज्यादा गहरी चीज है।
पहली बात – विश्वास: एक-दूसरे पर अटूट भरोसा। संदेह एकता का सबसे बड़ा दुश्मन है। जैसे ही आप अपने साथी पर शक करने लगे, दरार पड़ गई।
दूसरी बात – त्याग: कभी-कभी अपना छोटा स्वार्थ छोड़कर सामूहिक हित के लिए खड़ा होना पड़ता है। जो व्यक्ति हर समय “मेरा-मेरा” चिल्लाता है, वह एकता नहीं बना सकता।
तीसरी बात – समझ: हर व्यक्ति अलग है, हर व्यक्ति की परिस्थिति अलग है। एकता का मतलब सबको एक जैसा बनाना नहीं, बल्कि अलग-अलग होते हुए भी साथ चलना है।
चौथी बात – संवाद: बात करिए, समझिए, समझाइए। ज्यादातर फूट गलतफहमियों से पैदा होती है। अगर खुलकर बात हो जाए, तो सारे मतभेद दूर हो जाते हैं।
पांचवीं बात – सतर्कता: शोषक हमेशा सक्रिय रहते हैं। वे नए-नए तरीकों से फूट डालने की कोशिश करते हैं। हमें हमेशा जागरूक रहना होगा।

यह संघर्ष कभी खत्म नहीं होता
सबसे महत्वपूर्ण बात – एकता बनाना एक बारगी काम नहीं है। यह रोज का काम है, पल-पल का काम है, जीवन भर का काम है।
समझिए कैसे?
सुबह उठें: परिवार में सबसे प्रेम से बोले। कड़वाहट का एक शब्द भी रिश्तों में दरार डाल सकता है।
दफ्तर गए: सहकर्मियों के साथ सहयोग से काम करें। ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा टीम को कमजोर बनाती है।
शाम को: पड़ोसियों से मिलें, उनकी खबर लें। अलग-थलग समाज शोषण को निमंत्रण देता है।
रात को सोने से पहले: सोचें कि आज आपने एकता मजबूत की या कमजोर? क्या आपने किसी को जोड़ा या तोड़ा?
हर दिन यह मूल्यांकन जरूरी है। क्योंकि – एकता एक पेड़ की तरह है – खाद पानी चाहिए, रोज देखभाल चाहिए। एक दिन की लापरवाही और पेड़ सूखने लगता है।

आज के समय की चुनौतियां
आज का युग और भी जटिल है। सोशल मीडिया के जमाने में फूट डालना और आसान हो गया है। एक फर्जी खबर वायरल हो जाती है। समुदायों के बीच नफरत फैल जाती है। लोग बिना सोचे-समझे एक-दूसरे के खिलाफ हो जाते हैं।
राजनीति में वोट के लिए जाति, धर्म, भाषा के नाम पर विभाजन किया जाता है। आर्थिक असमानता बढ़ रही है, जिससे समाज में दूरी बढ़ती है।
लेकिन याद रखिए: जितनी बड़ी चुनौती, उतनी ही मजबूत एकता चाहिए।

एकता बनाने के व्यावहारिक सूत्र
परिवार में:-
– हर सदस्य की बात सुनें।
– छोटी-मोटी बातों पर लड़ाई न करें।
– त्योहारों और अवसरों पर साथ इकट्ठा हों।
– बुजुर्गों का सम्मान, बच्चों का ख्याल।
समाज में:-
– जाति-धर्म से ऊपर उठकर सोचें
– गरीब-अमीर का भेद मिटाएं
– महिलाओं को सम्मान दें
– युवाओं को जोड़ें, बांटें नहीं
संगठन में:-
– साफ और पारदर्शी व्यवहार रखें।
– हर सदस्य की राय को महत्व दें।
– सामूहिक निर्णय लें।
– किसी को अनदेखा न करें।

शोषण से मुकाबले की रणनीति
जब हम एकजुट होते हैं, तो शोषक की ताकत खुद-ब-खुद कम हो जाती है।
देखिए कैसे:-
एक गांव में एक साहूकार बहुत ऊंची ब्याज दर पर कर्ज देता था। गरीब किसान उसके कर्ज में फंसे रहते थे। एक दिन सभी किसानों ने मिलकर सहकारी समिति बना ली। अब वे आपस में कम ब्याज पर कर्ज लेने-देने लगे। साहूकार का धंधा ठप्प हो गया।
यह है एकता की ताकत। शोषक को चुनौती देने के लिए सामूहिक शक्ति चाहिए।

यह काम रुकता नहीं
बहुत लोग सोचते हैं कि एकबार एकता बन गई, फिर चैन की बांसुरी बजेगी। गलत!
एकता एक यात्रा है, मंजिल नहीं।आज आप एकजुट हैं, बहुत अच्छा। लेकिन कल नई चुनौती आएगी। नया शोषक आएगा। नया षड्यंत्र होगा।
इसीलिए कहा गया है – “जिंदा रहने तक, जिंदगी भर के लिए” एकता को मजबूत करते रहना होगा।
यह ठीक वैसे ही है जैसे स्वास्थ्य। आप एकबार व्यायाम कर लिए तो जीवन भर स्वस्थ नहीं रह सकते। रोज क़सरत करनी पड़ती है।
एकता भी रोज-रोज की साधना है!

यह लेख एक अपील है, एक जागृति है, एक संकल्प है।
हम सब समझते हैं कि एकता जरूरी है। लेकिन समझने से काम नहीं चलता, करना पड़ता है। हमें आज से और अभी से ही शुरू करना होगा।
– परिवार में प्रेम बढ़ाइए।
– समाज में भाईचारा बढ़ाइए।
– संगठन में सहयोग बढ़ाइए।
याद रखिए
“जब एकता घटती है तो शोषण बढ़ता है। और जब एकता बढ़ती है तो शोषण घटता है।”
यह गणित बदलता नहीं है। यह सार्वभौमिक सत्य है।
तो आइए, आज से संकल्प लें:
– हम अपनी आंतरिक एकता को रोज मजबूत बनाएंगे।
– हम किसी षड्यंत्र में नहीं फंसेंगे
– हम विभाजन की हर कोशिश को नाकाम करेंगे।
– हम साथ खड़े होंगे, साथ लड़ेंगे, साथ जीतेंगे।
क्योंकि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, लेकिन मुट्ठी भर चने मिलकर पहाड़ भी हिला सकते हैं। एकता में शक्ति है।  एकता में मुक्ति है। एकता में जीत है।
यह संघर्ष जीवन भर का है। लेकिन डरिए मत। क्योंकि जब हम साथ हैं, तो हम अजेय हैं।
एकता जिंदाबाद! समानता जिंदाबाद! मानवता जिंदाबाद!
साथियों, इस संदेश को अपने दिल में उतारिए और अपने जीवन में उतारिए। क्योंकि बदलाव हम से ही शुरू होता है, हमारे घर से ही शुरू होता है, हमारे समाज से ही शुरू होता है। आज का संकल्प ही कल की क्रांति बनता है। शुभकामनाएं!

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