‘हवा’ से लेकर ‘न्याय’ तक – पूरी तरह नाकाम!
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की चादर सिर्फ फेफड़ों को ही नहीं, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं और मीडिया की निष्पक्षता को भी ढंक रही है। सुप्रीम कोर्ट की वह टिप्पणी, जिसमें प्रदूषण नियंत्रण के उपायों को “पूरी तरह नाकाम” (Total Failure) कहा गया है, दरअसल केवल वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) पर नहीं, बल्कि समूचे प्रशासनिक और विनियामक ढांचे पर एक तमाचा है।
मीडिया का ‘कवरेज’ या ‘बचाव’?
आज के दौर में पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि खबरें गायब हैं, बल्कि संकट यह है कि ‘खबर’ को किस तरह से ‘दबा’ दिया जाता है। जब सुप्रीम कोर्ट सरकार की विफलता को “Total Failure” कहता है, तो अधिकांश मुख्यधारा के अखबार उस ‘विफलता’ शब्द को या तो हल्का कर देते हैं या हेडलाइन मैनेजमेंट के जरिए उसे सरकारी घोषणाओं (जैसे मजदूरों को ₹10,000 की सहायता) के नीचे दबा देते हैं।
यदि नौ प्रमुख अखबारों में से केवल एक-दो ही सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी को अपनी लीड का आधार बनाते हैं, तो यह मीडिया की ‘स्वाभाविक’ भूल नहीं, बल्कि ‘इरादतन’ बचाव है। यह उस ‘इको-सिस्टम’ का हिस्सा है जहाँ सरकार की आलोचना को लीपने-पोतने के लिए पूरी मशीनरी सक्रिय हो जाती है।
न्यायपालिका: ‘छक्के’ मारने की प्रवृत्ति और साख का संकट
चिंता का विषय केवल प्रदूषित हवा नहीं, बल्कि न्यायपालिका के भीतर बढ़ती एक विशेष प्रवृत्ति भी है। सुप्रीम कोर्ट की अपनी ही एक बेंच ने हाल ही में जजों में “रिटायर होने से पहले छक्के लगाने” (Hitting sixes before retiring) की बढ़ती प्रवृत्ति पर सवाल उठाए हैं। जब न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर खुद सर्वोच्च अदालत उंगली उठाए और विपक्ष भी सवाल खड़ा करे, तो उसे महज ‘राजनीति’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
संवैधानिक संस्थाओं पर ‘कब्जे’ या ‘दबाव’ के जो आरोप चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पर लगते रहे हैं, वे लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। जब पत्रकार जनहित के बजाय सरकार के बचाव में खड़े होकर विपक्ष पर हमला करने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ दीमक की भेंट चढ़ चुका है।
प्रदूषण और ‘रेवड़ी’ का घालमेल
दिल्ली सरकार द्वारा प्रदूषण रोकने के नाम पर निर्माण कार्यों पर रोक लगाना और फिर प्रभावित मजदूरों को ₹10,000 की ‘रेवड़ी’ बांटने की घोषणा करना, प्रभावी नीति के बजाय ‘हेडलाइन मैनेजमेंट’ अधिक प्रतीत होता है। वायु प्रदूषण जैसे गंभीर संकट का समाधान योग के प्रचार या आधे कर्मचारियों के ‘वर्क फ्रॉम होम’ जैसे तात्कालिक उपायों में नहीं, बल्कि उन व्यावहारिक और कारगर समाधानों में है जिन्हें लागू करने में सरकारें “पूरी तरह नाकाम” रही हैं।
मोदित्व, एक्रोनिम्स और हकीकत
सरकार की कार्यशैली अब ‘मंत्रों’, ‘अनुप्रासों’ और ‘संक्षिप्त नामों’ (Acronyms) की एक लंबी श्रृंखला बन गई है। चाहे वह परमाणु ऊर्जा विधेयक का नाम ‘शांति’ (SHANTI Bill 2025) रखना हो या अन्य लोक-लुभावन नाम, यह आकर्षक ब्रांडिंग की कला तो हो सकती है, लेकिन जमीनी स्तर पर विफलता को नहीं ढक सकती।
दिल्ली की जहरीली हवा इस बात का प्रमाण है कि ‘मोदित्व’ और उसकी ब्रांडिंग के दौर में आम नागरिक का ‘जीवन’ और ‘सांस’ प्राथमिकताओं की सूची में काफी नीचे हैं। जब अदालतें सरकार को ‘विफल’ घोषित करें और मीडिया उसे ‘सफल’ दिखाने का प्रयास करे, तो जनता को समझ लेना चाहिए कि उसे न केवल प्रदूषण से, बल्कि इस सूचनात्मक अंधकार से भी खुद ही लड़ना होगा।
(आलेख: प्रदीप शुक्ल)





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