रायगढ़ (पब्लिक फोरम)। रायगढ़ जिले में जिंदल कंपनी के विस्तार को लेकर प्रस्तावित विवादित जनसुनवाई अब निरस्त होने की कगार पर है। ग्रामीणों के भारी विरोध और प्रशासन के साथ हुई मैराथन चर्चा के बाद, घरघोड़ा एसडीएम ने संकेत दिए हैं कि जनसुनवाई को रद्द करने की प्रशासनिक प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। यह खबर उन हजारों ग्रामीणों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है, जो अपनी जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए कड़ाके की ठंड में भी संघर्ष कर रहे थे।
प्रशासन और ग्रामीणों के बीच बनी सहमति
घटनाक्रम में तब नया मोड़ आया जब घरघोड़ा एसडीएम ने मीडिया से बातचीत में स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि प्रशासन और आंदोलनकारी ग्रामीणों के प्रतिनिधिमंडल के बीच पहले चरण की चर्चा सकारात्मक रही है। एसडीएम के अनुसार, “ग्रामीणों द्वारा उठाई गई आपत्तियों और उनकी मांगों को प्रशासन ने अत्यंत गंभीरता से लिया है। बातचीत के बाद जनसुनवाई के निरस्तीकरण की प्रक्रिया आरंभ कर दी गई है। अब कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं का सूक्ष्म परीक्षण करने के बाद अंतिम निर्णय की आधिकारिक घोषणा की जाएगी।”
“निर्णायक मोड़ पर पहुंचा आंदोलन”
इस प्रशासनिक आश्वासन के बाद, जनसुनवाई के विरोध में चल रहा ग्रामीणों का आंदोलन एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। आंदोलन स्थल पर जहां कल तक आक्रोश और तनाव का माहौल था, वहां अब उम्मीद और उत्साह की लहर दौड़ गई है। ग्रामीण इसे अपने एकजुट संघर्ष की बड़ी जीत मान रहे हैं।
मामले के मुख्य बिंदु:
सकारात्मक वार्ता: प्रशासन और ग्रामीणों के बीच पहले दौर की बातचीत पूरी हो चुकी है।
🔹प्रक्रिया शुरू: एसडीएम ने पुष्टि की है कि जनसुनवाई रद्द करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं।
🔹अगला चरण: प्रशासन और ग्रामीणों के बीच जल्द ही अगले दौर की बातचीत संभावित है, जिसमें अंतिम रूपरेखा तय होगी।
मुख्यमंत्री का कड़ा रुख: दोषियों पर होगी कार्रवाई
इस पूरे मामले में प्रदेश के मुखिया का भी संवेदनशील चेहरा सामने आया है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस विवाद पर अपना बयान जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि सरकार जनहित के साथ है। उन्होंने कहा कि मामले में जो भी दोषी पाया जाएगा, उस पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। मुख्यमंत्री के इस बयान ने स्थानीय प्रशासन पर निष्पक्ष निर्णय लेने का नैतिक दबाव और बढ़ा दिया है।

लोकतंत्र में जनता की आवाज की जीत
यह घटनाक्रम केवल एक जनसुनवाई के रद्द होने का समाचार नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र में आम आदमी की ताकत का प्रमाण है। जब ग्रामीण अपनी माटी और अस्तित्व के लिए एक स्वर में बोलते हैं, तो व्यवस्था को भी झुकना पड़ता है। हालांकि, अंतिम निर्णय आना बाकी है, लेकिन प्रशासन की पहल और मुख्यमंत्री के बयान ने ग्रामीणों को यह विश्वास दिलाया है कि उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज नहीं, बल्कि लोकतंत्र की हुंकार है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन कितनी जल्दी इस पर अंतिम मुहर लगाता है, ताकि क्षेत्र में शांति और विश्वास पुनः स्थापित हो सके।





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