क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार? नियमों को कुचलकर दौड़ रहे अवैध स्कूली वाहन
खबर का असर: शून्य। मासूमों की सुरक्षा: राम भरोसे
रायगढ़ (पब्लिक फोरम)। सवाल चुभने वाला है, लेकिन पूछना जरूरी है- क्या हम किसी बड़े मातम का इंतजार कर रहे हैं? यह सवाल इसलिए, क्योंकि मासूम स्कूली बच्चों की जान को जोखिम में डालकर दौड़ रहे अवैध वाहनों की खबर प्रकाशित होने के बाद भी प्रशासनिक गलियारों में छाई खामोशी अब लापरवाही नहीं, बल्कि ‘अपराध’ जैसी प्रतीत हो रही है।
सड़कों पर वही पुराना मंजर है। न वाहनों पर पीली पट्टी है, न कमर्शियल नंबर प्लेट, न फिटनेस का ठिकाना और न ही बीमा का भरोसा। अगर कुछ बदला है, तो वह है अवैध वाहन संचालकों का हौसला, जो अब और भी बुलंद होकर प्रशासन की नाक के नीचे नियमों का मखौल उड़ा रहे हैं।
बेखबर नहीं, बेपरवाह है सिस्टम
यह कहना गलत होगा कि परिवहन विभाग, पुलिस या जिला प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं है। सच्चाई यह है कि वे ‘बेखबर’ नहीं, बल्कि ‘बेपरवाह’ हैं। खबर प्रकाशन के बाद उम्मीद थी कि महकमा जागेगा, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि न कोई जब्ती हुई, न किसी का लाइसेंस रद्द हुआ। सूत्रों की मानें तो विभागों में कुछ ‘आंतरिक चर्चाएं’ जरूर हुईं, लेकिन वे वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलकर सड़क तक नहीं आ सकीं। यह सन्नाटा चीख-चीख कर बता रहा है कि बच्चों की सुरक्षा प्रशासन की प्राथमिकता सूची में सबसे निचले पायदान पर है।

सामूहिक चुप्पी या मिलीभगत?
सफेद नंबर प्लेट वाली निजी वैन और ऑटो सुबह-शाम बच्चों को भूसे की तरह ठूंस-ठूंसकर (ओवरलोडिंग) ले जा रहे हैं। हर कोई जानता है।
🔹परिवहन विभाग के पास अवैध वाहनों की सूची है।
🔹पुलिस को इन वाहनों के रूट और टाइमिंग पता है।
🔹स्कूल प्रबंधन भली-भांति जानता है कि उनके छात्र किस ‘खटारा’ गाड़ी में आ रहे हैं।
इसके बावजूद यह ‘सामूहिक चुप्पी’ किसी बड़े भ्रष्टाचार या मिलीभगत की ओर इशारा करती है। जब कानून की रक्षा करने वाले ही मूकदर्शक बन जाएं, तो नियमों का पालन कौन कराएगा?
खतरे की घंटी: अनसुनी और अनदेखी
जरा सोचिए, जिस वाहन का बीमा नहीं है, खुदा न खास्ता अगर उसके साथ कोई दुर्घटना घट जाए, तो जिम्मेदारी कौन लेगा? बिना फिटनेस के दौड़ती गाड़ियाँ कब ब्रेक फेल का शिकार हो जाएं या कब टायर फट जाएं, कोई नहीं जानता। फर्स्ट-एड बॉक्स नदारद हैं, अग्निशमन यंत्र गायब हैं और चालक अनुभवहीन हैं। हम अपने बच्चों को स्कूल नहीं, बल्कि हर रोज एक संभावित खतरे के मुंह में भेज रहे हैं।
यह सिर्फ खबर नहीं, चेतावनी है
यह फॉलोअप रिपोर्ट प्रशासन के लिए एक सीधी और आखिरी चेतावनी है। अगर अब भी कोई सख्त और संयुक्त अभियान – जिसमें परिवहन, पुलिस और शिक्षा विभाग शामिल हों – नहीं चलाया गया, तो भविष्य में होने वाले किसी भी हादसे के लिए सिर्फ वाहन चालक नहीं, बल्कि जिले के आला अधिकारी भी सीधे तौर पर जिम्मेदार माने जाएंगे।
जनता की मांगे साफ़
🔹बिना कमर्शियल पंजीयन वाले सभी स्कूली वाहनों को तत्काल जब्त किया जाए।
🔹नियम तोड़ने वाले स्कूल संचालकों की मान्यता पर आंच आए।
🔹लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
प्रशासन को अपनी कुंभकर्णी नींद तोड़नी होगी। कानून किताबों की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं, सड़कों पर अनुशासन लाने के लिए होता है। याद रहे, इतिहास गवाह रहेगा कि खबरें चेतावनी देती रहीं और जिम्मेदार सोते रहे।
(रिपोर्ट: कैलाश आचार्य)





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