नई दिल्ली/भोपाल (पब्लिक फोरम)। एक तरफ देश में विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान की गूंज है, तो दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के सिंगरौली में विकास की वेदी पर लाखों पेड़ों की बलि चढ़ाने की तैयारी हो चुकी है। यह कहानी सिर्फ 6 से 10 लाख पेड़ों के कटने की नहीं है; यह कहानी उन हजारों आदिवासियों की है, जिनके लिए जंगल ही उनकी ‘मां’ है, उनका भगवान है और उनके जीवन यापन का एकमात्र सहारा है।
अडानी समूह के धिरौली कोल ब्लॉक प्रोजेक्ट के लिए 2,672 हेक्टेयर (लगभग 6,600 एकड़) जमीन आवंटित की गई है। एक ओर देश को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर एक कॉरपोरेट समूह को लाखों पेड़ काटने की अनुमति मिलना, सरकार की नीतियों पर गंभीर और विरोधाभासी सवाल खड़े कर रहा है।
परियोजना का सच: मुनाफे का पहाड़ और उजड़ते जंगल
सिंगरौली जिले का देवसर विकासखंड, जो कभी विंध्य क्षेत्र का ‘ऑक्सीजन बैंक’ कहलाता था, आज मशीनों की गड़गड़ाहट से कांप रहा है। इस परियोजना के कुछ प्रमुख तथ्य इस प्रकार हैं:
जमीन का आवंटन: कुल 2,672 हेक्टेयर भूमि आवंटित की गई है, जिसमें 1,397 हेक्टेयर से ज्यादा घने जंगल (वन भूमि) शामिल हैं।
पेड़ों की कटाई: अनुमान है कि 6 लाख से 10 लाख पेड़ काटे जाएंगे। अब तक 40,000 पेड़ काटे जा चुके हैं।
कोयले का भंडार और मुनाफा: इस ब्लॉक में 620 मिलियन मीट्रिक टन कोयला है, जिसकी कीमत लगभग 11 लाख करोड़ रुपये आंकी गई है। आरोप है कि इसके एवज में सरकार ने केवल 204 करोड़ रुपये में यह जंगल सौंप दिया है।
खदान की क्षमता: अदानी पॉवर को यह ब्लॉक 30 साल के पट्टे पर मिला है। इसकी उत्पादन क्षमता 6.5 मिलियन टन प्रति वर्ष तय की गई है। कंपनी का लक्ष्य 2027 तक खुली खदान से अधिकतम उत्पादन हासिल करना है।
आदिवासियों की आजीविका पर कुल्हाड़ी
आंकड़ों से परे हटकर देखें तो यह एक मानवीय त्रासदी है। सिंगरौली के ये जंगल सिर्फ लकड़ियों का ढेर नहीं हैं। साल, महुआ, चिरौंजी, आंवला, तेंदू, बीजा और बहेड़ा जैसे पेड़ पीढ़ियों से आदिवासी समुदायों की अर्थव्यवस्था का आधार रहे हैं। एक आदिवासी के लिए ‘महुआ’ का पेड़ गिरना सिर्फ एक पेड़ का गिरना नहीं है, बल्कि उसके बच्चों की शिक्षा, भोजन और भविष्य का कट जाना है। हजारों वर्षों से चली आ रही उनकी जीवनशैली को एक सरकारी आदेश ने रातों-रात खत्म कर दिया है। न उनके पास उचित मुआवजा पहुंचा है और न ही पुनर्वास की कोई ठोस व्यवस्था है। आज सिंगरौली का आदिवासी पूछ रहा है— क्या हमारा जंगल, हमारी जमीन सिर्फ कागजों की मोहताज है? क्या हम इंसान नहीं हैं?
राजनीतिक घमासान: “जंगल खत्म कर बनाया जा रहा अडानी देश”
इस मुद्दे ने अब एक बड़े राजनीतिक आंदोलन का रूप ले लिया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सिंगरौली का दौरा करने के बाद तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जल, जंगल और जमीन को नष्ट करके एक नया ‘अडानी देश’ बनाया जा रहा है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इसे सरकार का दोहरा मापदंड बताते हुए तंज कसा- “मां के नाम पर एक पेड़ और अडानी के नाम पर लाखों पेड़।”
हाल ही में सिंगरौली के विस्थापित आदिवासियों ने दिल्ली जाकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से भी मुलाकात की है। आदिवासियों ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि कैसे पेसा (PESA) कानून और वनाधिकार अधिनियम को ताक पर रखकर उनके अधिकारों को कुचला जा रहा है। राहुल और प्रियंका गांधी ने उन्हें सिंगरौली आने और इस लड़ाई में साथ देने का आश्वासन दिया है।
सात समंदर पार भी अडानी पर उठ रहे सवाल
सिंगरौली में आदिवासियों के अधिकारों के हनन के साथ-साथ अडानी समूह की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मुश्किलें कम नहीं हैं। अमेरिका में न्याय विभाग (DOJ) और SEC द्वारा गौतम अडानी, उनके भतीजे सागर अडानी और अन्य अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि 2020 से 2024 के बीच भारत में सोलर प्रोजेक्ट्स के महंगे कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए 250 मिलियन डॉलर (करीब 2100 करोड़ रुपये) की रिश्वत दी गई।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी एजेंसियां पिछले 14 महीने से अडानी को समन सौंपने की कोशिश कर रही हैं और उन्होंने भारत सरकार से मदद भी मांगी है। विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार अपने ‘करीबी मित्र’ को बचाने के लिए ढाल बनी हुई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को भी नुकसान पहुंच रहा है।
विकास की कीमत कौन चुकाएगा?
विकास किसी भी देश की जरूरत है, लेकिन सवाल यह है कि इसकी कीमत कौन चुका रहा है? जब एक आदिवासी अपने आंगन में लगे महुए के पेड़ को कटते हुए देखता है, तो उसके भीतर का भारत टूट जाता है। ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान की सफलता केवल शहरों में पौधे लगाने से तय नहीं होगी, बल्कि इस बात से तय होगी कि हम उन जंगलों को कैसे बचाते हैं जो पहले से ही लाखों जीवों और इंसानों की ‘मां’ बनकर उनका पालन-पोषण कर रहे हैं।
अगर विकास के नाम पर प्रकृति का अंधाधुंध दोहन और हाशिए पर खड़े लोगों का विस्थापन ऐसे ही चलता रहा, तो आने वाली पीढ़ियां कोयले की खदानों में जीवन नहीं, बल्कि सिर्फ राख ही तलाश पाएंगी। वक्त आ गया है कि सरकार कॉरपोरेट मुनाफे और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक संतुलन स्थापित करे, ताकि विकास के शोर में किसी आदिवासी की सिसकियां दब कर न रह जाएं।





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