कोरबा (पब्लिक फोरम)। गर्मी की भरी दोपहरी में घंटाघर के ओपन थिएटर पर मंगलवार को जुटे कोरबा के चौपाटी और फुटपाथ व्यापारियों के चेहरे पर गुस्सा और मायूसी साफ झलक रही थी। यहां एकत्र सैकड़ों छोटे दुकानदारों ने शहर को “स्मार्ट सिटी” बनाने के नाम पर अपनी रोजी-रोटी छीनने का आरोप लगाते हुए विधायक एवं श्रम मंत्री लखन लाल देवांगन, नगर निगम प्रशासन, जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की।
कोरबा शहर को स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत विकसित करने के लिए नगर निगम द्वारा चलाए जा रहे अभियान ने सड़क किनारे ठेले, खोमचे और फुटपाथ की दुकानें चलाने वाले परिवारों के सामने संकट खड़ा कर दिया है। व्यापारियों का आरोप है कि प्रशासन उनके सामान जब्त कर रहा है, मनमाना जुर्माना वसूल रहा है और उन्हें बिना विकल्प दिए उनकी आजीविका छीन ली गई है।
स्मार्ट सिटी बनी हमारे लिए अभिशाप!
बुधवारी बाजार से सुभाष चौक तक और ओपन थिएटर के चौपाटी में काम करने वाले 45 वर्षीय रामकृष्ण यादव कहते हैं, “हम 20 साल से यहां ठेला लगाते आए हैं। अचानक नगर निगम ने कहा कि यहां दुकानें नहीं लग सकते। सामान जब्त कर लिया, 5,000 रुपए जुर्माना भरवाया। यह स्मार्ट सिटी नहीं, गरीबों को तबाह करने की साजिश है।”
कई महिला व्यापारियों ने आंसू भरी आवाज में बताया कि गढ़कलेवा इलाके में दुकानें हटाए जाने के बाद उनका व्यवसाय पूरी तरह चौपट हो गया। “अब यहां भी हमें धक्के मारे जा रहे हैं। बच्चों का पेट कैसे भरें?” एक महिला ने सवाल उठाया।
प्रशासन पर तानाशाही के आरोप!
व्यापारियों का आरोप है कि नगर निगम के अधिकारी उनके साथ “तानाशाही व्यवहार” कर रहे हैं। “सुबह-सुबह टीम आती है, सामान उठा ले जाती है। छुड़ाने के लिए 2,000 से 10,000 रुपए तक मांगे जाते हैं। हम गरीबों के पास इतने पैसे कहां?” ठेला चलाने वाले सुरेश साहू ने बताया।
नारेबाजी के दौरान व्यापारियों ने साफ किया कि अगर उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो वे पूरे परिवार के साथ धरने पर बैठेंगे। “हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं। जिंदगी और मौत का सवाल है,” एक युवा व्यापारी ने गुस्से में कहा।
क्या कहता है दूसरा पक्ष?
नगर निगम के अधिकारियों या मंत्री लखन लाल देवांगन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत अवैध दुकानों और अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया जा रहा है।
मानवीय संदर्भ: गरीबी vs विकास
यह विवाद सिर्फ कोरबा तक सीमित नहीं है। देशभर में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स के नाम पर छोटे व्यवसायियों को विस्थापित किया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या विकास की कीमत गरीबों की आजीविका से चुकाना न्यायसंगत है? कोरबा के व्यापारियों का संघर्ष इसी टकराव की दास्तां बयां करता है।
कोरबा के फुटपाथ व्यापारियों की आवाज सिर्फ एक शहर की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की पड़ताल है जो “विकास” के नाम पर समाज के निचले तबके को नजरअंदाज करती है। प्रशासन और नेताओं के सामने अब चुनौती है कि वे इन गरीब परिवारों के हक में संवेदनशील निर्णय लें, नहीं तो यह आक्रोश और बढ़ सकता है।
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