back to top
सोमवार, फ़रवरी 2, 2026
होमदेशबजट 2026 विश्लेषण: रोजगार और राहत के मोर्चे पर मोदी सरकार फेल;...

बजट 2026 विश्लेषण: रोजगार और राहत के मोर्चे पर मोदी सरकार फेल; छत्तीसगढ़ से उठी तीखी आवाज़

नई दिल्ली/रायपुर (पब्लिक फोरम) चमकदार शब्दों और ‘विकसित भारत’ के सुनहरे सपनों के बीच, केंद्रीय बजट 2026-27 ने देश की उस विशाल आबादी को एक बार फिर निराश किया है, जो पहले से ही महंगाई, बेरोजगारी और घटती आमदनी के बोझ तले दबी है। वैश्विक अनिश्चितता और घरेलू आर्थिक चुनौतियों के बीच पेश किया गया यह बजट, अर्थशास्त्रियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की नज़र में मोदी सरकार का अब तक का “सबसे जनविरोधी दस्तावेज” बनकर उभरा है।
भाकपा (माले) लिबरेशन, छत्तीसगढ़ के राज्य सचिव बृजेन्द्र तिवारी ने इस बजट को अमीरों की तिजोरी भरने और गरीबों को उनके जल, जंगल और ज़मीन से बेदखल करने का ‘नुस्खा’ करार दिया है।

खोखले वादे और ज़मीनी हकीकत
बजट का विश्लेषण करने पर एक कड़वी सच्चाई सामने आती है। जहां एक ओर सरकार ‘विकसित भारत’ का दम भर रही है, वहीं दूसरी ओर आम आदमी की क्रय शक्ति (Purchasing Power) रसातल में जा रही है। यह बजट उन उम्मीदों पर एक क्रूर प्रहार है, जो मानती थीं कि बढ़ती महंगाई से निपटने के लिए मध्यम और गरीब वर्ग की आमदनी बढ़ाने के उपाय किए जाएंगे। इसके विपरीत, सामाजिक सुरक्षा और गरीबी उन्मूलन की योजनाओं में या तो कटौती की गई है या आवंटन को स्थिर रखा गया है, जो वास्तविक मुद्रास्फीति को देखते हुए ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।

लापरवाही के चौंकाने वाले आंकड़े
सरकार की नियत पर सबसे बड़ा सवाल उसके खर्च करने के तरीके पर उठता है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के आंकड़े गवाह हैं कि सरकार ने जानबूझकर जनकल्याणकारी योजनाओं का पैसा बचाया है:-

🔹प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी): 19,974 करोड़ के बजट के मुकाबले मात्र 7,500 करोड़ खर्च।
🔹पीएम आवास (ग्रामीण): 54,832 करोड़ के मुकाबले केवल 32,500 करोड़ खर्च।
🔹मनरेगा और ग्राम सड़क योजना जैसे ग्रामीण भारत की रीढ़ माने जाने वाले क्षेत्रों में भी भारी कटौती की गई है।

यह ‘बचत’ नहीं, बल्कि ज़रूरतमंदों के हक पर डाका है। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्रों में आवंटन ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है, जबकि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर और दवाइयां नदारद हैं। सरकार का पूरा ज़ोर निजीकरण पर है, जिससे इलाज और पढ़ाई आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही है।

किसान: तकनीक के नाम पर छलावा
देश का अन्नदाता आज भी हाड़-तोड़ मेहनत के बाद खाली हाथ है। बजट में न तो एमएसपी (MSP) की कानूनी गारंटी का ज़िक्र है, न ही जलवायु परिवर्तन से बर्बाद होती फसलों के लिए किसी राहत पैकेज का। सरकार ‘ड्रोन’ और ‘एआई’ (AI) के सुनहरे सपने दिखाकर कृषि क्षेत्र को भी कॉर्पोरेट के हवाले करने की तैयारी में है। कृषि अनुसंधान के बजट में कटौती यह साबित करती है कि सरकार की प्राथमिकता में किसान नहीं, बल्कि एग्री-बिज़नेस करने वाली बड़ी कंपनियां हैं।

शिक्षा: ज्ञान नहीं, सस्ता मज़दूर तैयार करने की फैक्ट्री
शिक्षा क्षेत्र को लेकर सरकार का नज़रिया बेहद चिंताजनक है। बजट के प्रावधान इशारा करते हैं कि अब स्कूल और कॉलेज ज्ञान के मंदिर नहीं, बल्कि उद्योगों के लिए ‘सस्ता लेबर’ तैयार करने वाले कारखाने बनेंगे। गेमिंग इंडस्ट्री और कंटेंट क्रिएशन के लिए छात्रों को तैयार करने का प्रस्ताव यह बताता है कि सरकार युवाओं को गंभीर बौद्धिक विकास के बजाय केवल बाज़ार का पुर्जा बनाना चाहती है।

पर्यावरण विनाश और विस्थापन का खतरा
‘क्लाउड डेटा सेंटर्स’ के लिए भारी टैक्स छूट और ‘रेयर अर्थ कॉरिडोर’ जैसी योजनाएं पर्यावरण के लिए खतरे की घंटी हैं। ये परियोजनाएं भारी मात्रा में बिजली और पानी की खपत करेंगी, जिससे भूजल स्तर गिरेगा और प्रदूषण बढ़ेगा। इसके साथ ही, आदिवासियों और गरीबों को उनकी ज़मीनों से विस्थापित करने का एक नया चक्र शुरू होगा।

असमानता का दस्तावेज
कुल मिलाकर, 53.47 लाख करोड़ रुपये का यह बजट मात्र 5.6% की वृद्धि दर्शाता है, जो जीडीपी की विकास दर से भी कम है। बजट का एक बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज़ का ब्याज चुकाने में जा रहा है। कॉरपोरेट टैक्स में छूट और काला धन रखने वालों को ‘अभयदान’ देना, जबकि गरीब की थाली से राशन कम करना—यह बजट स्पष्ट करता है कि सरकार की वफ़ादारी देश की जनता के प्रति नहीं, बल्कि चंद पूंजीपतियों के प्रति है।
यह बजट सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि देश के मज़दूरों, किसानों और युवाओं के भविष्य के साथ एक बड़ा खिलवाड़ है।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments