नेपाल की राजनीति में भूकंप: स्थिरता की तलाश में जनता ने चुना नया रास्ता
नेपाल के हालिया संसदीय चुनावों ने हिमालयी गणराज्य की राजनीति की पूरी बिसात पलट दी है। 5 मार्च के इन चुनावों में पैंतीस वर्षीय बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) ने दशकों पुरानी कम्युनिस्ट पार्टियों और नेपाली कांग्रेस को धूल चटाते हुए ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया है। इंजीनियर और रैपर से राजनेता बने बालेंद्र शाह काठमांडू के मेयर रह चुके हैं और अब प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार बनकर उभरे हैं।
Gen-Z की लहर, तीन देश – एक जैसा बदलाव
नेपाल की यह राजनीतिक करवट श्रीलंका और बांग्लादेश में आए बदलावों से गहरे तौर पर मेल खाती है। तीनों देशों में Gen-Z युवाओं के नेतृत्व में शक्तिशाली जन-आंदोलन उठे, सत्ता की जड़ें हिलीं और राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। नेपाल में सितंबर 2025 में केपी ओली सरकार की विदाई इसी लहर का हिस्सा थी – और अब मतदाताओं ने चुनावी मुहर लगाकर उसे पुष्ट कर दिया है।
हालाँकि तीनों देशों में बदलाव का रंग अलग-अलग रहा। श्रीलंका में हाशिए पर पड़ी पार्टी जेवीपी सत्ता के केंद्र तक पहुँची। बांग्लादेश में आवामी लीग पर चुनाव लड़ने का प्रतिबंध लगा और नई ताकतों ने बागडोर थामी। नेपाल में सत्ताधारी दल सीधे एक बिल्कुल नई चुनौती के सामने चुनावी मैदान में उतरे – और हार गए।
RSP का सफर: 2022 से 2025 तक
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी कोई रातोंरात उभरी शक्ति नहीं है। 2022 के चुनावों में ही इस पार्टी ने 275 में से 20 सीटें जीतकर चौथी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी। पार्टी के नेता रवि लामिछाने प्रचंड के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री भी बने – हालाँकि बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिकता विवाद में उन्हें पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया। लामिछाने ने उपचुनाव जीतकर वापसी की और पार्टी ने अपनी साख और मजबूत की।
इस चुनाव में निर्णायक मोड़ तब आया जब बालेंद्र शाह RSP में शामिल हुए और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए गए। उन्होंने विशेष रूप से अपदस्थ प्रधानमंत्री केपी ओली के खिलाफ मैदान चुना और ओली को अपमानजनक हार झेलनी पड़ी।
जनादेश का संदेश: स्थिरता और स्वच्छ शासन
2008 में गणतंत्र की स्थापना के बाद से नेपाल में अब तक चौदह सरकारें आ चुकी हैं। कोई भी सरकार अपना पूरा कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। भ्रष्टाचार की बढ़ती धारणा, व्यवस्था में सड़ांध, बुजुर्ग शासकों और युवा मतदाताओं के बीच गहरी पीढ़ीगत खाई – इन सबने जनता को विद्रोही बना दिया। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की बिना उकसावे की गोलीबारी ने आग में घी डाला। इस विशाल जनादेश का अर्थ सीधा है – नेपाल की जनता स्थिरता चाहती है, स्वच्छ शासन चाहती है और नए चेहरों पर भरोसा करने को तैयार है।
RSP का एजेंडा और आगे की चुनौतियाँ
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी खुद को मध्यपंथी, सुधारवादी और लोकतांत्रिक पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती है। राजतंत्र की बहाली या नेपाल को हिंदू राज्य बनाने के लिए कोई उल्लेखनीय जनसमर्थन नहीं दिखता — खुलकर राजतंत्र की वकालत करने वाली पार्टी को केवल एक सीट मिल सकी। हाँ, राष्ट्रपति प्रणाली और तकनीक-आधारित शासन की ओर रुझान जरूर दिखाई देता है।
नई सरकार के सामने विदेश नीति की कड़ी परीक्षाएँ होंगी। एक ओर मोदी सरकार और आरएसएस का वैचारिक-राजनीतिक दबाव, दूसरी ओर चीन पर बढ़ती आर्थिक निर्भरता – दोनों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। विदेशों में काम करने वाले नेपाली मजदूरों का प्रेषण (रेमिटेंस) देश की आय का प्रमुख स्रोत है। ऐसे में अमेरिका-इज़राइल-ईरान युद्ध के बाद खाड़ी क्षेत्र में छाई अस्थिरता और प्रवासी-विरोधी माहौल नेपाल के लिए एक और गंभीर चिंता बन सकती है।

कम्युनिस्टों के लिए चेतावनी की घंटी
नेपाल के कम्युनिस्ट आंदोलन ने ऐतिहासिक रूप से संवैधानिक राजतंत्र से बहुदलीय संसदीय गणराज्य तक के सफर में अग्रणी भूमिका निभाई थी। 1990 के दशक से बार-बार सत्ता में आकर जनता का विश्वास भी जीता। लेकिन यह चुनावी पराजय एक बड़ा चेतावनी संकेत है। दो विशाल पड़ोसियों – भारत और चीन – के बीच एक भूआवेष्ठित छोटे देश की जटिल आर्थिक और भू-राजनीतिक चुनौतियाँ नेपाल के कम्युनिस्टों को नई ऊर्जा और नई दिशा के साथ पुनर्निर्माण की माँग करती हैं।
Gen-Z के संघर्षों से जुड़कर, जनआकांक्षाओं की नब्ज पहचानकर और व्यावहारिक प्रगतिशील राजनीति की नई राह बनाकर ही नेपाल का कम्युनिस्ट आंदोलन फिर से अपनी प्रासंगिकता साबित कर सकता है।
(आलेख: दीपांकर भट्टाचार्य, राष्ट्रीय महासचिव, भाकपा माले लिबरेशन)





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