दिसंबर 2025 में सामने आया महादेव ऐप घोटाला भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। यह केवल एक आर्थिक अनियमितता का मामला नहीं है, बल्कि सत्ता, मीडिया और न्यायिक व्यवस्था के बीच संदिग्ध संबंधों का जटिल जाल है।
प्रधानमंत्री कार्यालय में संचार के विशेष अधिकारी हीरेन जोशी पर मीडिया चैनलों को समाचार शीर्षक तय करने और विदेशी बेटिंग सिंडिकेट महादेव ऐप से जुड़े होने के गंभीर आरोप लगे हैं। यह मामला किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि सत्ता के केंद्रीकरण का दुरुपयोग किस हद तक हो रहा है।
प्रसार भारती के चेयरमैन नवनीत सहगल का अचानक इस्तीफा और उनके बेटे का महादेव घोटाले से कथित संबंध यह दर्शाता है कि देश का सार्वजनिक प्रसारण संस्थान किस तरह विवादों में घिरा है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर जब सवाल उठने लगें, तो यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की स्वतंत्रता पर गंभीर खतरा माना जाना चाहिए।
कानूनी व्यवस्था पर उठते सवाल
23वें विधि आयोग के पूर्णकालिक सदस्य हितेश जैन को मात्र छह महीने में इस्तीफा देना पड़ा। उन पर आरोप है कि उन्होंने इस नेटवर्क को कानूनी सुरक्षा प्रदान की। यह चिंताजनक है कि देश का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी निकाय, जहां संवैधानिक सुधारों पर विचार होना चाहिए, संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ा हो सकता है।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अब तक 170 से अधिक छापेमारी की है और लगभग 3,000 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की है। यह आंकड़े इस मामले की गंभीरता को स्पष्ट करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने फरार आरोपियों को ट्रेस करने के आदेश दिए हैं। देशभर में फैला हवाला नेटवर्क यह साबित करता है कि यह एक संगठित अपराध है, जिसे उच्च स्तर पर संरक्षण मिला होने की आशंका है।
धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम का उल्लंघन केवल कानूनी अपराध नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय हित के विरुद्ध कार्य है।
राजनीतिक जवाबदेही की मांग
यह मामला दो महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल खड़े करता है। पहला, क्या यह सत्ता के केंद्र में बैठे लोगों द्वारा डिजिटल माध्यमों का दुरुपयोग है? दूसरा, क्या यह केवल कुछ भ्रष्ट अधिकारियों तक सीमित है या पूरी व्यवस्था में गहरी जड़ें हैं?
सोशल मीडिया पर #MahadevInPMO जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। जनता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि पारदर्शी जवाबदेही चाहती है। प्रधानमंत्री कार्यालय का एक अधिकारी इतने बड़े बेटिंग नेटवर्क से कैसे जुड़ा, यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
क्या यह कार्रवाई चुनावों से पहले की चुनिंदा सफाई अभियान है, या संस्थाओं को शुद्ध करने का वास्तविक प्रयास? यह सवाल महत्वपूर्ण है।
जब लोकतांत्रिक संस्थाएं, मीडिया और न्यायिक व्यवस्था अवैध धन और राजनीतिक प्रभाव के सामने कमजोर पड़ने लगें, तो संविधान की मूल भावना “जनता द्वारा, जनता के लिए शासन” खतरे में पड़ जाती है।
सच्चाई की पूर्ण जांच जरूरी
प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय जांच ब्यूरो और सर्वोच्च न्यायालय को इस नेटवर्क की जड़ों तक पहुंचना होगा, चाहे वह राजनीतिक शीर्ष तक ही क्यों न जाए। अन्यथा यह मामला भी इतिहास की अधूरी कहानियों में शामिल हो जाएगा।
देश को केवल सच नहीं, पूरा सच चाहिए। यह समय है कि संस्थाओं की विश्वसनीयता बहाल की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि कानून सभी के लिए समान है।





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