बिलासपुर (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ से आजीविका की तलाश में दूसरे राज्यों में जाने वाले प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा और उनके अधिकारों को लेकर एक बड़ा कदम उठाया गया है। लोक सिरजनहार यूनियन (LSU) ने राज्य के श्रम विभाग में एक व्यापक सूचना का अधिकार (RTI) आवेदन दायर कर प्रवासी मजदूरों की मौत, दुर्घटनाओं, शोषण और उन्हें मिलने वाले मुआवजे का पूरा आधिकारिक ब्यौरा मांगा है। संगठन का आरोप है कि इस बेहद संवेदनशील और गंभीर मुद्दे पर शासन का रवैया लंबे समय से उदासीन रहा है, जिसके कारण यह कदम उठाना पड़ा।
आरटीआई के जरिए पूछे गए 13 तीखे सवाल
लोक सिरजनहार यूनियन के कार्यालय सचिव अजय अनंत द्वारा श्रम आयुक्त कार्यालय में दायर इस आरटीआई में कुल 13 बिंदु शामिल किए गए हैं। संगठन ने विभाग से वर्षवार और राज्यवार उन मामलों का विवरण मांगा है, जिनमें छत्तीसगढ़ के प्रवासी श्रमिकों के साथ कार्यस्थलों पर दुर्घटना, गंभीर चोट, विकलांगता, लापता होने, हिंसा, बंधक बनाए जाने या मानव तस्करी जैसी गंभीर घटनाएं घटी हैं।
इस आवेदन में सबसे संवेदनशील पहलू प्रवासी मजदूरों के साथ रहने वाले उनके आश्रित बच्चों और पत्नियों की सुरक्षा को लेकर उठाया गया है। यूनियन ने पूछा है कि अन्य राज्यों में खदानों, ईंट-भट्टों, जलाशयों या निर्माण स्थलों पर काम के दौरान छत्तीसगढ़ के कितने श्रमिक परिवारों के बच्चों की असामयिक मौत हुई है और इसका क्या रिकॉर्ड सरकार के पास उपलब्ध है।
मुआवजे और राहत योजनाओं की हकीकत पर नजर
अक्सर देखा जाता है कि हादसों के बाद पीड़ित परिवारों को कानूनी सहायता या मुआवजा मिलने में बरसों लग जाते हैं। एलएसयू ने अपने आवेदन में स्पष्ट रूप से पूछा है कि पिछले वर्षों में कितने मामलों में प्रभावित परिवारों को कानूनी मुआवजा, आर्थिक सहयोग, अनुग्रह राशि या पुनर्वास सहायता दी गई? इसके साथ ही विभाग से उन मामलों के कारणों की भी समीक्षा मांगी गई है जहां पीड़ित परिवारों को अब तक कोई सहायता नहीं मिल सकी है।
क्या सरकार के पास डेटा ही नहीं है?
इस आरटीआई का बिंदु क्रमांक 10 प्रशासनिक व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। यूनियन ने विभाग से कहा है कि यदि उनके पास ऐसी घटनाओं का कोई अलग से रिकॉर्ड (अभिलेख) उपलब्ध नहीं है, तो वे लिखित में स्पष्ट रूप से बताएं कि विभाग द्वारा ऐसी जानकारी संधारित (maintain) नहीं की जाती है। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पुख्ता आंकड़ों के अभाव में प्रवासी मजदूरों के लिए कोई भी प्रभावी नीति बनाना असंभव है।
इसके अलावा, पिछले दस वर्षों में प्रवासी श्रमिकों के कल्याण, सुरक्षा और पुनर्वास पर विभाग द्वारा किए गए कुल बजट आवंटन और वास्तविक खर्च का ब्यौरा भी मांगा गया है।
सामाजिक और प्रशासनिक प्रभाव: एक विश्लेषण
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों से हर साल लाखों की संख्या में मजदूर पलायन करते हैं। ईंट-भट्टों, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और कृषि कार्यों के लिए दूसरे राज्यों में जाने वाले ये मजदूर अक्सर ठेकेदारों के शोषण, असुरक्षित कार्यदशाओं और स्थानीय स्तर पर हिंसा का शिकार होते हैं।
प्रशासनिक स्तर पर एक केंद्रीयकृत और पारदर्शी डेटाबेस न होने के कारण, हादसे की स्थिति में इन मजदूरों की पहचान और उनके परिवारों तक राहत पहुंचाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। लोक सिरजनहार यूनियन का यह कदम न केवल श्रम विभाग को उसकी कानूनी जवाबदेही की याद दिलाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगा कि राज्य सरकार अपने सबसे कमजोर और श्रमशील वर्ग को लेकर कितनी गंभीर है।
प्रवासी मजदूर किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि वे सबसे ज्यादा अदृश्य और उपेक्षित भी होते हैं। लोक सिरजनहार यूनियन द्वारा दायर यह आरटीआई केवल सूचनाएं जुटाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह शासन की प्राथमिकताओं को परखने का एक पैमाना भी है। यूनियन के मुताबिक, इस आरटीआई से मिलने वाले जवाबों के आधार पर आगे की जन-कार्यवाही की रूपरेखा तय की जाएगी। इसके साथ ही, संगठन ने आम नागरिकों से भी अपील की है कि यदि उनके पास ऐसी किसी भी अप्रिय घटना या शोषण के प्रमाणित तथ्य हों, तो वे उन्हें साझा करें ताकि इस सामाजिक लड़ाई को और मजबूती दी जा सके। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि श्रम विभाग इन बुनियादी सवालों का क्या और कितना पारदर्शी जवाब देता है।





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