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कोरबा: रानी अटारी खदान में किसान सभा की 9 घंटे की हड़ताल, 32 मजदूर बहाल

कोरबा। (पब्लिक फोरम)। एसईसीएल के चिरमिरी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली रानी अटारी और विजय वेस्ट भूमिगत कोयला खदानों में मजदूरों की बहाली की मांग को लेकर शुक्रवार को खदान बंद आंदोलन किया गया। छत्तीसगढ़ किसान सभा के आह्वान पर हुए इस आंदोलन में खनन प्रभावित गांवों के सैकड़ों मजदूरों और किसानों ने भाग लिया। आंदोलनकारियों के अनुसार, आउटसोर्सिंग कंपनी जेएमएस ने 32 मजदूरों को बिना पूर्व सूचना दिए खनन कार्य से हटा दिया था। इसके विरोध में ग्रामीणों ने सुबह 6 बजे से दोपहर 3 बजे तक खदान का काम बंद कराया और कोयला परिवहन रोक दिया।

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किसान सभा का दावा है कि इस दौरान खदानों में उत्पादन पूरी तरह ठप रहा। एसईसीएल प्रबंधन द्वारा सभी 32 मजदूरों को काम पर वापस लेने की लिखित घोषणा के बाद आंदोलन समाप्त कर दिया गया।

प्रबंधन ने मानीं मांगें, मजदूरों की बहाली पर बनी सहमति
आंदोलन के बाद प्रबंधन की ओर से मजदूरों की बहाली और ठेका श्रमिकों से जुड़ी अन्य समस्याओं के समाधान के संबंध में लिखित आश्वासन दिया गया। किसान सभा के अनुसार, समझौते में निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं।

– 32 मजदूरों की बहाली: जेएमएस द्वारा काम से हटाए गए सभी 32 कर्मचारियों को तत्काल काम पर वापस लेने की घोषणा की गई।

– वीटीसी पूरा कर चुके प्रभावितों को काम: जिन प्रभावितों का वीटीसी (व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रमाणपत्र) कराया जा चुका है, उन्हें खदान के काम में तत्काल नियोजित करने का आश्वासन दिया गया।

– मजदूरी का भुगतान: सभी ठेका कर्मचारियों को सात तारीख तक मजदूरी का भुगतान करने की बात कही गई है। हालांकि, संबंधित महीने का उल्लेख उपलब्ध प्रेस नोट में नहीं है।

– बैठाए गए दिनों की मजदूरी: जिन 32 मजदूरों को काम से बाहर रखा गया था, उस अवधि की मजदूरी के भुगतान के लिए उच्चाधिकारियों से चर्चा करने का आश्वासन दिया गया।

इस प्रकार, मजदूरों की बहाली को लेकर तत्काल सहमति बन गई है, लेकिन काम से बाहर रखे गए दिनों की मजदूरी का भुगतान अभी आश्वासन के स्तर पर है। इस मांग पर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।

किसान सभा ने एसईसीएल और ठेका कंपनियों की भूमिका पर उठाए सवाल
छत्तीसगढ़ किसान सभा के प्रदेश अध्यक्ष प्रशांत झा ने आरोप लगाया कि एसईसीएल क्षेत्र में आउटसोर्सिंग कंपनियां मजदूरों और किसानों का शोषण कर रही हैं। उन्होंने एसईसीएल प्रबंधन पर भी ठेका कंपनियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया।
प्रशांत झा ने मांग की कि काम से बाहर रखे गए 32 मजदूरों को उस अवधि की मजदूरी भी दी जाए, जिसमें उन्हें काम नहीं मिला। उनके अनुसार, केवल काम पर वापस लेना पर्याप्त नहीं है; मजदूरों को रोजगार से जुड़ी आर्थिक सुरक्षा भी मिलनी चाहिए।

किसान सभा के कोरबा जिला सचिव दीपक साहू ने कहा कि केंद्र सरकार श्रम कानूनों के पालन पर जोर देती है, लेकिन सरकारी कंपनी एसईसीएल के क्षेत्र में ठेका श्रमिकों के साथ हो रहे व्यवहार पर सवाल उठते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि भविष्य में ठेका मजदूरों को परेशान किया गया तो संगठन और व्यापक आंदोलन करेगा।
हालांकि, ठेका कंपनी जेएमएस और एसईसीएल प्रबंधन का इस संबंध में विस्तृत पक्ष उपलब्ध प्रेस नोट में शामिल नहीं है। इसलिए मजदूरों को हटाने के कारणों और प्रबंधन की भूमिका से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

पंडो आदिवासी किसान भी आंदोलन में शामिल हुए
इस आंदोलन में खनन प्रभावित गांवों के आदिवासी किसान और मजदूर भी शामिल हुए। किसान सभा के अनुसार, इनमें पंडो जनजाति के किसान भी थे, जो अपने रोजगार की सुरक्षा की मांग को लेकर आंदोलन में उतरे।
भू-विस्थापित रोजगार एकता संघ के सचिव दामोदर श्याम ने आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि रानी अटारी खदान के प्रभावित गांवों के अनेक किसान ठेका मजदूर के रूप में काम करते हैं। इनमें से अधिकांश आदिवासी और छोटे किसान परिवारों से आते हैं।

उन्होंने कहा कि खनन परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी एसईसीएल की है। उनके अनुसार, कंपनी प्रभावित लोगों को नियमित और स्थायी रोजगार देने की जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रही है और ठेका मजदूरों को रोजगार की सुरक्षा भी नहीं मिल पा रही है।
दामोदर श्याम ने यह भी कहा कि इससे प्रभावित गांवों के किसानों में असंतोष बढ़ रहा है। उनके वक्तव्य से रोजगार के सवाल का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है – भूमि और आजीविका पर खनन परियोजनाओं के प्रभाव का सामना करने वाले परिवारों के लिए रोजगार की निरंतरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी रोजगार की उपलब्धता।

जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने दिया आंदोलन को समर्थन
खदान बंद आंदोलन में स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया। आंदोलन का समर्थन करने वालों में पुटीपखना के सरपंच चंद्र प्रताप पोर्ते, जनपद सदस्य संतोष मरावी और आनंद सिंह आयाम तथा अडसरा के सरपंच धजवान सिंह आयाम शामिल रहे।
किसान सभा की ओर से बृजलाल पंडो, रामेश्वर, उजागर, देवप्रताप, जगबंधन, बाबूलाल और अमर सिंह सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण आंदोलन में उपस्थित थे।

पंडो जनजाति के किसानों और अन्य प्रभावित ग्रामीणों की भागीदारी यह दर्शाती है कि खदान क्षेत्र में रोजगार का सवाल केवल ठेका कंपनी और उसके कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। इसका संबंध उन परिवारों की आर्थिक सुरक्षा से भी है, जिनकी आजीविका खनन परियोजनाओं से प्रभावित हुई है।

रानी अटारी और विजय वेस्ट खदानों में नौ घंटे की बंदी के बाद 32 मजदूरों की बहाली पर सहमति बनना आंदोलन का महत्वपूर्ण परिणाम है। लेकिन इस घटनाक्रम का वास्तविक समाधान तभी माना जाएगा, जब सभी मजदूरों को नियमित रूप से काम मिले, मजदूरी समय पर दी जाए और काम से बाहर रखे गए दिनों के भुगतान पर भी स्पष्ट निर्णय हो।

खनन प्रभावित परिवारों के लिए रोजगार केवल आय का साधन नहीं, बल्कि उनके जीवन और भविष्य की सुरक्षा का आधार है। इसलिए एसईसीएल प्रबंधन और संबंधित ठेका कंपनी की जिम्मेदारी है कि मजदूरों की समस्याओं का समाधान लिखित आश्वासनों तक सीमित न रहे, बल्कि उन्हें व्यवहार में लागू किया जाए।

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