कांकेर (पब्लिक फोरम)। इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज, कांकेर में कार्यरत प्लेसमेंट कर्मचारियों का दिनभर चला काम बंद आंदोलन मंगलवार की शाम प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद समाप्त हो गया। एसडीएम, श्रम पदाधिकारी, अस्पताल प्रबंधन, कर्मचारियों और यूनियन प्रतिनिधियों के बीच हुई बहुपक्षीय बैठक में समझौता होने के बाद सभी कर्मचारी काम पर लौट आए।
रात 12 बजे WhatsApp से निकाला – सुबह फूटा आक्रोश
मामले की जड़ उस रात में है, जब ठेकेदार के सुपरवाइजर ने दो सफाई कर्मचारियों को रात 12 बजे महज एक WhatsApp संदेश भेजकर सेवा से निकाल दिया। इस अपमानजनक और मनमाने कदम ने कर्मचारियों में भारी रोष भर दिया। अगली सुबह तड़के ही कोमलदेव अस्पताल, अलबेलापारा के मातृ-शिशु सदन और नादनमारा के मेडिकल कॉलेज में कार्यरत प्लेसमेंट कर्मचारियों ने एकजुट होकर काम बंद कर दिया और सुबह 9 बजे कांकेर पुलिस थाने पहुंचकर ठेकेदार व उसके सुपरवाइजर के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने की मांग की।
वेतन गबन का गंभीर आरोप
आंदोलनकारी कर्मचारियों का आरोप था कि ठेकेदार सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन की पूरी राशि मेडिकल कॉलेज से आहरण करता था, लेकिन कर्मचारियों को उससे कम राशि का भुगतान करता था। इतना ही नहीं, कर्मचारियों के बैंक खातों से वेतन की राशि वापस मंगवाकर उन्हें धमकाने और डराने का काम भी किया जाता था। यह आर्थिक शोषण पिछले “चार वर्षों” से जारी था।
तहसीलदार से बात नहीं मानी, कलेक्टर ने संभाली कमान
पुलिस थाने में ही तहसीलदार ने आंदोलनकारियों से बातचीत कर मामला सुलझाने की कोशिश की, लेकिन कर्मचारियों ने इसे अस्वीकार कर दिया। शिकायत दर्ज होने के बाद “कलेक्टर ने स्वयं हस्तक्षेप किया” और एसडीएम, श्रम पदाधिकारी, अस्पताल अधिकारियों, कर्मचारियों एवं यूनियन प्रतिनिधियों के बीच उच्चस्तरीय बैठक आयोजित कराई।
बैठक में हुए ये अहम फैसले
बहुपक्षीय चर्चा में निम्नलिखित बिंदुओं पर सहमति बनी –
– वेतन गबन की जांच: पिछले चार वर्षों में कम भुगतान की गई राशि के संदर्भ में श्रम पदाधिकारी “15 दिनों के भीतर” जांच कर कानूनी कार्यवाही करेंगे।
– ESI कार्ड वितरण: सभी कर्मचारियों को 6 दिनों के भीतर ESI कार्ड वितरित किए जाएंगे। जिन कर्मचारियों को कार्ड न होने के कारण लाभ नहीं मिला, उनके लिए भी श्रम पदाधिकारी उचित कार्यवाही करेंगे।
– नौकरी सुरक्षित: किसी भी कर्मचारी को काम से नहीं निकाला जाएगा।
– सुपरवाइजर को नसीहत: ठेकेदार के सुपरवाइजर को स्पष्ट हिदायत दी गई कि वह कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार न करे।
– FIR की मांग पर विचार: सरकारी राशि के गबन के आरोप में कंपनी मालिक के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग पर कुछ दिनों का समय मांगा गया है।
– मिनिट्स ऑफ मीटिंग: बैठक में लिए गए सभी निर्णयों का लिखित विवरण सभी पक्षों के हस्ताक्षर के बाद उन्हें सौंपा जाएगा।
यह मामला केवल एक अस्पताल के कर्मचारियों का नहीं, बल्कि उस व्यापक ठेका-प्रथा के शोषण का आईना है, जहां कागज पर न्यूनतम वेतन लागू है – लेकिन जेब तक पहुंचता है आधा। अब देखना यह है कि 15 दिनों की श्रम जांच केवल कागजी खानापूर्ति बनती है, या मजदूरों को उनका चार साल का हक वाकई मिलता है।





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