कोरबा (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में अडानी समूह के अंतर्गत संचालित पूर्व अमरकंटक लैंको पावर प्लांट की यूनिट 34 से जुड़ा एक गंभीर विवाद अब सड़क से सीधे जिला प्रशासन के दरवाजे तक पहुंच गया है। भारतीय युवा कांग्रेस, कोरबा (शहर एवं ग्रामीण) ने जिलाधीश को एक ज्ञापन सौंपकर अडानी कंपनी के दो वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध तत्काल FIR दर्ज करने की मांग की है।
14 साल का वादा, आज भी कागजों में दफन
वर्ष 2011 में अमरकंटक लैंको पावर प्लांट की यूनिट 34 की स्थापना के लिए कोरबा जिले में 1700 से अधिक पट्टाधारी परिवारों की भूमि अधिग्रहित की गई थी। भूमि देने के बदले इन परिवारों को स्थायी रोजगार का स्पष्ट आश्वासन दिया गया था – एक वादा, जो आज 14 वर्षों के बाद भी पूरी तरह खोखला साबित हुआ है। सैकड़ों परिवार अपनी जमीन गंवाकर आज भी रोजगार की राह देख रहे हैं।
शासकीय दस्तावेज को ‘फर्जी’ बताना – गंभीर आरोप
युवा कांग्रेस के अनुसार, अडानी कंपनी के दो वरिष्ठ अधिकारी – जनरल मैनेजर विकास ठाकुर और प्रोजेक्ट हेड सी.वी.के. प्रसाद – ने जिला प्रशासन द्वारा डिस्पैच नंबर सहित जारी आधिकारिक सूची को ‘फर्जी’ करार दे दिया। यह केवल एक आरोप नहीं, बल्कि प्रशासनिक दस्तावेजों की खुली अवमानना है। इससे भी गंभीर बात यह है कि इस कदम से प्रभावित परिवारों को भ्रमित कर उनके वैध हक को दबाने का सुनियोजित प्रयास किया जा रहा है।
युवा कांग्रेस की तीन सूत्रीय मांगें
जिलाधीश को सौंपे गए ज्ञापन में जिला युवा कांग्रेस ने तीन ठोस मांगें रखी हैं:—
पहली, शासकीय दस्तावेज को ‘फर्जी’ बताने और भ्रामक जानकारी फैलाने के आरोपी दोनों अधिकारियों पर तत्काल FIR दर्ज की जाए। दूसरी, वर्ष 2011 के सभी 1700 से अधिक विस्थापित पट्टाधारी परिवारों को शीघ्र स्थायी रोजगार उपलब्ध कराने हेतु ठोस कार्यवाही की जाए। तीसरी, संपूर्ण मामले की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई अमल में लाई जाए।
“प्रशासन स्वतः संज्ञान ले”
युवा कांग्रेस के जिलाध्यक्ष (शहर) राकेश पंकज और जिलाध्यक्ष (ग्रामीण) विकास सिंह ने जिला प्रशासन से मांग की है कि वह इस प्रकरण में स्वतः संज्ञान लेते हुए विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित करे। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि शीघ्र कार्यवाही नहीं हुई तो संगठन बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होगा।

यह मामला केवल कोरबा के 1700 परिवारों की पीड़ा नहीं है – यह उस व्यापक सवाल को भी उठाता है कि जब कोई बड़ा औद्योगिक समूह विकास के नाम पर जमीन लेता है, तो विस्थापितों को दिए गए वादे कितने पवित्र और बाध्यकारी हैं। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस ज्ञापन पर कितनी गंभीरता से संज्ञान लेता है।





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