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मारुति सुजुकी मजदूरों की लड़ाई: संसद में समर्थन की गुहार

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मारुति सुजुकी मजदूरों की लड़ाई: संसद में समर्थन की गुहार

नई दिल्ली (पब्लिक फोरम)। मारुति सुजुकी संघर्ष समिति के सदस्यों ने अपनी समस्याओं और मांगों को लेकर सीपीआई-एमएल के सांसदों से मुलाकात की और संसद में समर्थन की अपील की। यह मुलाकात भारत के औद्योगिक परिदृश्य में मजदूर अधिकारों और उनके संघर्ष की एक अहम कहानी को उजागर करती है।

शोषणकारी नीतियों के खिलाफ मजदूरों का संघर्ष
मारुति के मजदूर 2011 से शोषणकारी काम की स्थितियों, “हायर एंड फायर” जैसी अमानवीय नीतियों और अपने संगठन के अधिकारों के लिए लगातार लड़ रहे हैं। इस संघर्ष के दौरान उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा है, जिनमें नौकरी से निकाला जाना, झूठे मुकदमों में फंसाना और जेल में डालना शामिल है। इसके बावजूद मजदूर अपने अधिकारों के लिए अडिग हैं।
वर्तमान में यह लड़ाई मानेसर में चल रहे तीन महीने लंबे धरने के रूप में जारी है। यह धरना भारत के विकास की कथित “उन्नति” के पीछे छिपी सामाजिक और आर्थिक असमानता को उजागर करता है, जहां विकास का मतलब अक्सर मजदूरों के शोषण, बेरोजगारी और उनके अधिकारों पर हमले से होता है।

मांगों को संसद में उठाने का आश्वासन
सीपीआई-एमएल के सांसदों, जिनमें कॉमरेड राजाराम सिंह और कॉमरेड सुदामा प्रसाद शामिल हैं, ने मजदूरों की बातों को गंभीरता से सुना और उनकी मांगों को संसद में उठाने का आश्वासन दिया। मजदूरों की प्रमुख मांगों में शामिल हैं।
1. निकाले गए मजदूरों की बहाली: वे मजदूर, जिन्हें संघर्ष के कारण नौकरी से निकाल दिया गया, उन्हें पुनः बहाल किया जाए।
2. संविदा मजदूरों के लिए उच्च वेतन: 2024 में प्रबंधन के साथ हुए समझौते के तहत संविदा मजदूरों को वादा किया गया वेतन दिया जाए।
3. स्थायी भर्ती: स्थायी प्रकृति के कार्यों के लिए स्थायी मजदूरों की भर्ती सुनिश्चित की जाए।

मजदूर संघर्ष का व्यापक संदेश
मारुति सुजुकी मजदूर संघर्ष केवल एक कारखाने या एक समूह तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में श्रमिक अधिकारों और नव-उदारवादी नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाने का प्रतीक है। यह उस असमानता की ओर भी इशारा करता है, जहां मजदूरों के अधिकारों को अक्सर दबाया जाता है और उनकी मेहनत का फल बड़ी कंपनियों के मुनाफे के रूप में सिमट जाता है।
यह संघर्ष उन लाखों मजदूरों को प्रेरणा देता है, जो अपने अधिकारों के लिए लड़ने का साहस जुटा रहे हैं। संसद में इस मुद्दे को उठाने का वादा एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह देखना बाकी है कि यह मजदूरों की स्थिति में ठोस बदलाव ला पाएगा या नहीं।