गुरूवार, मार्च 5, 2026
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बराबरी, न्याय और शांति: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ऐपवा की हुंकार; वैश्विक युद्ध से लेकर महिलाओं के कर्ज तक पर उठाए गंभीर सवाल

नई दिल्ली/रायपुर (पब्लिक फोरम)। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) महज एक उत्सव का दिन नहीं, बल्कि यह उन करोड़ों महिलाओं के संघर्षों को याद करने और उनके हक की आवाज उठाने का दिन है, जो सदियों से हाशिए पर रही हैं। इसी कड़ी में, अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (ऐपवा), छत्तीसगढ़ ने इस वर्ष महिला दिवस के अवसर पर ‘बेहतरी, बराबरी और न्याय’ के लिए एक व्यापक आह्वान किया है। संगठन ने एक ओर जहां अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे अंतरराष्ट्रीय तनाव पर गहरी चिंता व्यक्त की है, वहीं दूसरी ओर भारत में महिलाओं की सुरक्षा, आर्थिक तंगी, और सामाजिक भेदभाव जैसे ज्वलंत मुद्दों पर सरकार से तीखे सवाल पूछे हैं।

क्या है मामला और क्यों उठ रही है आवाज?
ऐपवा ने अपने बयान में 115 साल पुराने उस इतिहास को याद दिलाया है, जब मजदूर महिलाओं ने काम के अमानवीय घंटों के खिलाफ हड़ताल की थी और ‘शांति और रोटी’ की मांग की थी। संगठन का कहना है कि आज सवा सदी बाद भी हालात बहुत नहीं बदले हैं। आज भी एक आम औरत घर चलाने के लिए माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के कर्ज के जाल में फंसने को मजबूर है और दुनिया पर मंडराते युद्ध के बादलों का सबसे बड़ा खामियाजा भी उसी को भुगतना पड़ता है।

राजनीति, पूंजी और सत्ता का गठजोड़: एपस्टीन फाइल का जिक्र
महिला सुरक्षा के मुद्दे पर ऐपवा ने सख्त रुख अपनाते हुए हाल ही में सार्वजनिक हुई ‘एपस्टीन फाइल’ का मुद्दा उठाया है। संगठन ने आरोप लगाया है कि दुनिया भर के बड़े राजनेताओं, अरबपतियों और रसूखदारों द्वारा बच्चियों के यौन शोषण के इस मामले में भारतीय नेताओं और उद्योगपतियों के नाम भी सामने आए हैं। ऐपवा ने पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के इस्तीफे और इस मामले में प्रधानमंत्री से जवाब की मांग की है। संगठन का यह भी आरोप है कि जब शीर्ष स्तर पर बैठे लोग ऐसे मामलों में घिरते हैं, तो आम महिलाओं को न्याय मिलने की उम्मीद धूमिल हो जाती है। देश में बलात्कारियों को मिलने वाले राजनीतिक संरक्षण और उनका महिमामंडन महिलाओं के सम्मान पर गहरी चोट है।

सामाजिक भेदभाव और मनुवादी सोच पर प्रहार
यह केवल आर्थिक या राजनीतिक लड़ाई नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ भी एक जंग है जो महिलाओं और वंचितों को आगे बढ़ने से रोकती है। ऐपवा ने कुछ बेहद मार्मिक और चिंताजनक उदाहरण पेश किए हैं:-

🔸उड़ीसा के एक गांव में दलित शिक्षिका की नियुक्ति होने पर महीनों तक बच्चों को आंगनबाड़ी न भेजना।
🔸शैक्षणिक संस्थानों (जैसे जेएनयू और डीयू) में यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन का समर्थन करने वाले छात्र-छात्राओं पर हमले और उनकी गिरफ्तारियां।
🔸ऑनर किलिंग, आत्महत्या के लिए विवश की जाने वाली लड़कियां और न्यायालयों द्वारा बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में दी जाने वाली सजा को कम करना।

संगठन का मानना है कि यह सब उस ‘ब्राह्मणवादी’ या ‘मनुवादी’ सोच का परिणाम है, जो वैज्ञानिक तर्क और महिलाओं की बराबरी को अपनी सत्ता के लिए खतरा मानती है।

आम औरत की जिंदगी पर सीधा असर
आंकड़ों और राजनीति से परे, अगर एक आम महिला की जिंदगी को देखें तो हालात और भी चुनौतीपूर्ण लगते हैं। मनरेगा जैसी योजनाओं के कमजोर पड़ने और नए श्रम कानूनों के आने से महिला मजदूरों के अधिकार छिने जा रहे हैं। जब एक गरीब मां को अपने बच्चों का पेट पालने के लिए ऊंचे ब्याज दरों पर कर्ज लेना पड़ता है, तो उसके लिए ‘सशक्तीकरण’ के वादे बेमानी हो जाते हैं।

ऐपवा की प्रमुख मांगें:
इस महिला दिवस पर ऐपवा ने समाज और सरकार के सामने 8 सूत्रीय मांगें रखी हैं:

🔹अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध रोकने के लिए भारत सरकार कूटनीतिक पहल करे।
🔹एपस्टीन फाइल मामले में नाम आने पर मंत्री हरदीप सिंह पुरी तुरंत इस्तीफा दें।
🔹एपस्टीन मामले में उठे सवालों पर प्रधानमंत्री स्पष्टीकरण दें।
🔹मजदूरों के खिलाफ बनाए गए चारों नए श्रम कानून वापस लिए जाएं।
🔹माइक्रोफाइनेंस कंपनियों द्वारा की जा रही मनमानी ब्याज वसूली और महिलाओं के उत्पीड़न पर सख्त रोक लगे।
🔹गरीब और कामकाजी महिलाओं के छोटे कर्ज माफ किए जाएं।
🔹आंगनबाड़ी, आशा और अन्य स्कीम वर्कर्स महिलाओं को सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए।
🔹देश की हर महिला के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सुनिश्चित किया जाए।

आधी आबादी का पूरा सच
ऐपवा का यह मांग-पत्र केवल एक राजनीतिक या सामाजिक विरोध नहीं है। यह उस मां, उस बहन और उस बेटी की चीख है, जो आज भी अपने अस्तित्व, अपनी सुरक्षा और अपनी दो वक्त की रोटी के लिए लड़ रही है। जब किसी राज्य में अंतरजातीय विवाह पर कानून का पहरा बिठाया जाता है या किसी दलित महिला के हाथ का खाना खाने से इनकार कर दिया जाता है, तो यह हार सिर्फ उस महिला की नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक समाज के रूप में हमारी होती है।

“8 मार्च का दिन हमें यह याद दिलाता है कि महिलाओं को देवी बनाकर पूजने से ज्यादा जरूरी उन्हें इंसान मानकर उनके हक और उनकी बराबरी का सम्मान करना है। जब तक समाज का हर वर्ग, संस्थाएं और सरकारें महिलाओं की पीड़ा के प्रति संवेदनशील नहीं होंगी, तब तक असली ‘नारी शक्ति’ का उदय एक अधूरा सपना ही रहेगा।”

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