राजनांदगांव (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (छ.मु.मो.) के कार्यकर्ता और समर्थक कामरेड शंकर गुहा नियोगी का 33वां शहीद दिवस और शहीद भगत सिंह का 117वां जन्मदिवस मनाने के लिए रविवार को राजनांदगांव रेलवे स्टेशन के पास ऑटो स्टैंड पर एकत्रित हुए। सुबह 9:30 बजे से शुरू हुए इस आयोजन में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया। करीब 12 बजे छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा और प्रगतिशील सीमेंट श्रमिक संघ के नेतृत्व में एक रैली निकाली गई। यह रैली पोस्ट ऑफिस चौक, कामठी लाइन, हलवाई लाइन, गुड़ाखू लाइन और जूनी हटरी होते हुए जय स्तंभ चौक, मानव मंदिर चौक से गुरुद्वारा चौक होते हुए इमाम चौक फ्लाईओवर के नीचे एक सभा के रूप में तब्दील हो गई।
रैली में लाल और हरे कपड़े पहने महिलाओं और पुरुषों ने “नियोगी हत्या कांड की दोबारा जांच करो,” “शहीद शंकर गुहा नियोगी अमर रहें,” और “शहीद भगत सिंह जिंदाबाद” जैसे नारे लगाए। सभा की शुरुआत शहीद शंकर गुहा नियोगी और शहीद भगत सिंह के चित्रों पर माल्यार्पण कर और मौन धारण करके श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इसके बाद क्रांतिकारी गीतों के साथ सभा को प्रारंभ किया गया।

वक्ताओं का जोश और आरोपियों की बरी
सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कामरेड शंकर गुहा नियोगी के संघर्ष को याद किया। उन्होंने बताया कि 28 सितंबर 1991 की रात भिलाई के हुडको कार्यालय में सोते समय नियोगी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। सीबीआई ने इस मामले में भिलाई सिम्प्लेक्स के मालिक मूलचंद शाह समेत 9 लोगों को आरोपी बनाया था। दुर्ग सत्र न्यायालय ने गोली मारने वाले पलटन मल्लाह को फांसी की सजा और उद्योगपति मूलचंद शाह सहित 5 लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। लेकिन बाद में, सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए पलटन मल्लाह की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया और बाकी सभी आरोपियों को बरी कर दिया।
सभा में वक्ताओं ने राष्ट्रपति से पुनः अपील करते हुए कहा कि इस मामले की फिर से जांच होनी चाहिए ताकि असली दोषियों को फांसी की सजा दी जा सके। इस संदर्भ में राष्ट्रपति कार्यालय ने छत्तीसगढ़ सरकार के मुख्य सचिव को समुचित कार्रवाई के लिए पत्र भी भेजा था, लेकिन राज्य सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कामरेड शंकर गुहा नियोगी के संघर्ष को याद किया। उन्होंने बताया कि 28 सितंबर 1991 की रात भिलाई के हुडको कार्यालय में सोते समय नियोगी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। सीबीआई ने इस मामले में भिलाई सिम्प्लेक्स के मालिक मूलचंद शाह समेत 9 लोगों को आरोपी बनाया था। दुर्ग सत्र न्यायालय ने गोली मारने वाले पलटन मल्लाह को फांसी की सजा और उद्योगपति मूलचंद शाह सहित 5 लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। लेकिन बाद में, सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए पलटन मल्लाह की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया और बाकी सभी आरोपियों को बरी कर दिया।
सभा में वक्ताओं ने राष्ट्रपति से पुनः अपील करते हुए कहा कि इस मामले की फिर से जांच होनी चाहिए ताकि असली दोषियों को फांसी की सजा दी जा सके। इस संदर्भ में राष्ट्रपति कार्यालय ने छत्तीसगढ़ सरकार के मुख्य सचिव को समुचित कार्रवाई के लिए पत्र भी भेजा था, लेकिन राज्य सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

सभा में नेताओं के वक्तव्य
सभा में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के भीमराव बागड़े, महाराष्ट्र के पुणे से आए एक्टू के राष्ट्रीय सचिव कामरेड उदय भट्ट, छ.मु.मो. के उपाध्यक्ष ए.जी. कुरैशी, भिलाई से एक्टू के राज्य महासचिव बृजेन्द्र तिवारी, वासुकी प्रसाद उन्मत, श्यामलाल साहू, ए.सी.सी. भिलाई से भुवन साहू, धनंजय शर्मा, मोहम्मद अली, रायपुर से छत्तीसगढ़ किसान महासभा के नरोत्तम शर्मा, राजनांदगांव की वंदना मेश्राम, बिलासपुर से प्रदीप कुमार साहू, दक्षिण कोशल के संपादक सुशांत कुमार, अभनपुर से हेमंत साहू, बिलासपुर कोटा से प्रदीप साहू, रसमड़ा औद्योगिक क्षेत्र से दिलीप पारकर, भोजराम साहू, और अधिवक्ता वीरेंद्र उइके सहित कई लोगों ने संबोधित किया।
सभा के दौरान छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट बिलासपुर के माननीय मुख्य न्यायाधीश, माननीय मुख्य सचिव और माननीय श्रम सचिव मंत्रालय नया रायपुर के नाम एक ज्ञापन जिला कलेक्टर के प्रतिनिधि को सौंपा गया। सभा का संचालन तुलसी देवदास और पूनाराम साहू ने किया। छ.मु.मो. के महासचिव पूनाराम साहू ने उक्त जानकारी दी।
“कामरेड शंकर गुहा नियोगी की हत्या छत्तीसगढ़ में मजदूर आंदोलन की एक काली रात थी। इस मामले में सीबीआई की जांच और कोर्ट के फैसले से यह सवाल उठता है कि क्या न्याय वास्तव में हुआ? सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी आरोपियों को बरी करना, और पलटन मल्लाह की सजा को आजीवन कारावास में बदलना, लोगों के बीच एक बड़ी निराशा का कारण बना। ऐसे मामलों में निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की जरूरत होती है ताकि दोषियों को सही सजा मिल सके। इस घटना को 33 साल हो गए हैं, लेकिन मजदूरों की मांगें और आक्रोश आज भी जीवित हैं। यह एक गंभीर मुद्दा है कि इतने सालों बाद भी न्याय की आस लगाए लोग क्या कभी संतुष्ट हो पाएंगे? इसका जवाब भविष्य के हाथ में है।”
इस मामले में सरकार और न्यायपालिका दोनों को आगे आकर उचित और पारदर्शी जांच करानी चाहिए, ताकि समाज में न्याय की स्थापना हो सके और लोगों का विश्वास तंत्र पर कायम रह सके।
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