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बैंक कर्मचारियों की तीन दिवसीय हड़ताल को कोरबा में भाकपा का समर्थन

पांच दिन के कार्य-सप्ताह और स्थायी भर्ती की मांग पर भाकपा साथ. सार्वजनिक बैंकिंग बचाने की लड़ाई.

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कोरबा (पब्लिक फोरम)। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की जिला परिषद कोरबा ने यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन्स (यूएफबीयू) की तीन दिवसीय राष्ट्रव्यापी हड़ताल का समर्थन किया है। हड़ताल 28, 29 और 30 सितंबर को है। पार्टी का कहना है कि यह आंदोलन सिर्फ वेतन-भत्तों का नहीं, बल्कि सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था को बचाने का सवाल है। पार्टी ने जिले के मजदूरों, किसानों, कर्मचारियों और युवाओं से हड़ताल को सफल बनाने की अपील की है।
सोमवार को जारी बयान में भाकपा के जिला सचिव पवन कुमार वर्मा ने कहा कि हड़ताल के पीछे कर्मचारियों की कई पुरानी मांगें हैं। उनके अनुसार मुख्य मांगें ये हैं:

– सभी शनिवारों को अवकाश घोषित कर सप्ताह में पांच दिन काम लागू किया जाए।
– परफॉर्मेंस लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना में किए गए एकतरफा और भेदभावपूर्ण बदलाव वापस लिए जाएं।
– 12वें द्विपक्षीय समझौते के लंबित मुद्दे हल हों। इनमें पेंशन अपडेशन, सभी पेंशनरों के लिए समान महंगाई राहत (डीए) और एनपीएस से पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) में लौटने का विकल्प शामिल हैं।
– बैंकों में वर्षों से खाली पदों पर स्थायी भर्ती हो, अस्थायी, संविदा और बिजनेस कॉरेस्पॉन्डेंट कर्मियों को नियमित किया जाए और आउटसोर्सिंग पर रोक लगे।

सरकार पर आरोप
पवन कुमार वर्मा ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने मार्च 2024 में हुए द्विपक्षीय समझौते को मंजूरी नहीं दी। उनके मुताबिक इंसेंटिव ढांचे में एकतरफा बदलाव भी समझौतों का उल्लंघन है।
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या 28 से घटाकर 12 कर दी है। उनका दावा है कि अब क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) को कॉरपोरेट घरानों को सौंपने की तैयारी है। वर्मा के अनुसार इससे बैंककर्मियों की नौकरी की सुरक्षा और गरीब तबके की बैंकिंग तक पहुंच, दोनों पर असर पड़ेगा। ये आरोप भाकपा के हैं। इस खबर के लिखे जाने तक केंद्र सरकार या वित्त मंत्रालय का पक्ष सामने नहीं आया था।

तीन दिन की हड़ताल में शाखाओं का कामकाज प्रभावित हो सकता है। ऐसे में नकद लेनदेन, चेक क्लियरेंस और पेंशन जैसी सेवाओं पर निर्भर आम ग्राहकों को असुविधा हो सकती है। ग्रामीण इलाकों में, जहां विकल्प कम हैं, इसका असर ज्यादा महसूस हो सकता है। ग्राहकों को जरूरी काम पहले निपटाने और डिजिटल माध्यमों का उपयोग करने की सलाह दी जाती है।

बैंक कर्मचारियों की मांगें सिर्फ उनके कामकाज की शर्तों तक सीमित नहीं हैं। भर्ती, आउटसोर्सिंग और ग्रामीण बैंकों का भविष्य ऐसे सवाल हैं, जिनका सीधा संबंध आम खाताधारक से भी है। हड़ताल के पक्ष और विपक्ष में तर्क अपनी जगह हैं, लेकिन असली कसौटी यह है कि संवाद से समाधान निकलता है या नहीं। तब तक कर्मचारी और ग्राहक, दोनों के लिए ये तीन दिन कठिन रह सकते हैं।

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