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गुरूवार, जनवरी 22, 2026
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कोल इंडिया के 50 साल: उत्पादन तिगुना, नौकरियां आधी – ठेका प्रथा और विस्थापन की कड़वी सच्चाई

गेवरा से कुसमुंडा तक: खदानों ने निगले 20 गांव, 7805 हेक्टेयर खेत – छत्तीसगढ़ में कोयले की काली हकीकत

मशीनीकरण की चमक के पीछे उजड़ते गांवों की सिसकियां

कोरबा (पब्लिक फोरम)। 01 नवंबर 1975 को जब देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कोल इंडिया लिमिटेड की नींव रखी गई तब इसके पास 6.70 लाख स्थायी कर्मचारियों की फौज थी आज 2024-25 में यह तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है कोयला खदानों में मशीनों का शोर तो बढ़ा है और उत्पादन में 3 गुना की ऐतिहासिक वृद्धि भी हुई है लेकिन इस विकास की कीमत उन मजदूरों ने चुकाई है जिनकी नौकरियां खत्म हो गईं और उन किसानों ने जिनकी जमीनें खदानों में समा गईं।

उत्पादन का नया रिकॉर्ड, रोजगार का ब्लैकआउट

आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि कोल इंडिया में पिछले तीन दशकों में स्थायी कार्यबल में 65% की भारी गिरावट आई है वर्ष 1995 में जब कंपनी 237 मिलियन टन कोयला निकाल रही थी तब 6.40 लाख स्थायी कर्मचारी तैनात थे आज उत्पादन बढ़कर 773 मिलियन टन (वर्ष 2024-25) पहुंच गया है लेकिन स्थायी कर्मचारी घटकर मात्र 2.20 लाख रह गए हैं इस खाई को भरने के लिए ठेका प्रथा (Outsourcing) का सहारा लिया गया है अकेले SECL (साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) में आज लगभग 44,000 स्थायी कर्मियों के मुकाबले 1,07,626 ठेका मजदूर काम कर रहे हैं यानी प्रबंधन अब स्थायी रोजगार देने के बजाय सस्ते और अस्थाई श्रम पर निर्भर है।

SECL जमीन ली लाखों एकड़, नौकरी मिली चंद सैकड़ों को

छत्तीसगढ़ की लाइफलाइन कही जाने वाली SECL ने अब तक 1,85,575 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया है लेकिन इस भूमि के बदले मिलने वाले रोजगार की रफ्तार सुस्त है पिछले तीन वर्षों में जहां 1,85,000 एकड़ से अधिक जमीन अधिग्रहित हुई उसके एवज में केवल 1200 लोगों को रोजगार दिया गया वहीं सीधी भर्ती में भी केवल 1300 लोगों को ही मौका मिला।

उजड़ती खेती, बढ़ता खनन, गेवरा-दीपका- कुसमुंडा का संकट

एशिया की सबसे बड़ी परियोजनाओं में शुमार गेवरा दीपका और कुसमुंडा में खनन के कारण लगभग 7805 हेक्टेयर कृषि भूमि का अस्तित्व खत्म हो गया है आने वाले समय में 5000 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि का अर्जन प्रस्तावित है खेती योग्य भूमि के कम होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा गई है।

गेवरा परियोजना

यहां 20 से ज्यादा गांवों का अस्तित्व मिट चुका है पुनर्वास की स्थिति यह है कि प्रभावित गांवों में बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है।

प्रबंधन की नाकामी, आवासों पर कब्जा और संसाधनों की बर्बादी

एक ओर जहां कंपनी नए आवासों के निर्माण पर करोड़ों खर्च कर रही है वहीं दूसरी ओर पुराने संसाधनों का प्रबंधन करने में नाकाम साबित हो रही है।

कोल इंडिया के पास 3.80 लाख आवास हैं जबकि कर्मचारी केवल 2.20 लाख
अकेले गेवरा में 3200 क्वार्टर्स में से 250 पर अवैध कब्जा है।
प्रबंधन इन अवैध कब्जाधारियों को हटाने के बजाय उनके बिजली और पानी का खर्च वहन कर रहा है जो सीधे तौर पर राजस्व की हानि है।

मुख्य मुद्दे जो समाधान मांगते हैं!

पुनर्वास की बदहाली

प्रभावित गांवों के लिए बनाई गई नीतियां केवल कागजों तक सीमित हैं विस्थापितों को मिलने वाला मुआवजा और सुविधाएं ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं।

सुरक्षा और वेतन विसंगति

ठेका मजदूरों से काम तो स्थायी कर्मचारियों जैसा लिया जा रहा है लेकिन उन्हें मिलने वाली सुरक्षा और वेतन में जमीन-आसमान का अंतर है।

कृषि का संकट

उपजाऊ भूमि के खनन क्षेत्र में तब्दील होने से भविष्य में खाद्य सुरक्षा की चुनौती पैदा हो सकती है।

कोल इंडिया और उसकी सहायक कंपनियां उत्पादन के नए शिखर तो छू रही हैं लेकिन कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) और मानवीय संवेदनाओं के मोर्चे पर पीछे छूटती नजर आ रही हैं यदि रोजगार पुनर्वास और स्थायी कार्यबल पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह काला सोना स्थानीय समुदायों के लिए केवल काला अंधेरा बनकर रह जाएगा।
( उपरोक्त आंकड़े गूगल से प्राप्त है आधिकारिक आंकड़े अलग हो सकते हैं ) 
सपूरन कुलदीप
अध्यक्ष
ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति

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