कांकेर (पब्लिक फोरम)। केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा संसद में प्रस्तुत किए गए बजट पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए नागरिक अधिकार रक्षा मंच के नेता सुख रंजन नंदी ने कहा कि यह बजट आम जनता की जरूरतों और भावनाओं से पूरी तरह कटे हुए है। उन्होंने आरोप लगाया कि बजट में न तो बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस नीति है और न ही अमीरी-गरीबी के बढ़ते अंतर को कम करने का कोई प्रभावी उपाय।
श्री नंदी ने कहा कि देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर अनुमान से कम रही है, जबकि औद्योगिक उत्पादन में गिरावट आर्थिक संकट को और गहरा करेगी। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए, तो इसका सीधा असर रोजगार और आम उपभोक्ताओं की क्रयशक्ति पर पड़ेगा।
उन्होंने विशेष रूप से लघु एवं छोटे उद्योगों (MSME) की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि इस क्षेत्र के लिए निर्धारित लगभग 8.1 लाख करोड़ रुपये का ऋण निवेश नहीं हो पाया है। कर्ज की अनुपलब्धता के कारण छोटे उद्योग गंभीर संकट से जूझ रहे हैं, जिससे लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है।
श्री नंदी ने यह भी कहा कि सरकारी कर्ज और सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात बढ़कर 55.6 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका है, जो देश की वित्तीय स्थिरता के लिए खतरनाक संकेत है।
सरकार पर घोषणाओं को लागू न करने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2025-26 में खाद सब्सिडी पर 1 लाख 86 हजार 460 करोड़ रुपये खर्च करने की घोषणा की गई थी, लेकिन इस वर्ष केवल 1 लाख 70 हजार 781 करोड़ रुपये का ही आवंटन किया गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 16 हजार करोड़ रुपये कम है। इसी प्रकार खाद्यान्न मद में भी पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 1 हजार करोड़ रुपये की कटौती की गई है।
शिक्षा क्षेत्र की स्थिति को चिंताजनक बताते हुए श्री नंदी ने कहा कि पिछले वर्ष 1 लाख 28 हजार 650 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, लेकिन खर्च केवल 1 लाख 10 हजार 736 करोड़ रुपये ही हुआ। यह तब है जब देश के अनेक स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है और बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में भी यही स्थिति देखने को मिली। कुल 98 हजार 311 करोड़ रुपये के आवंटन में से केवल 94 हजार 625 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए, जिससे लगभग 4 हजार करोड़ रुपये बिना उपयोग के रह गए। उन्होंने कहा कि यह लापरवाही उस समय और गंभीर हो जाती है जब आम जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे अधिक आवश्यकता है।
श्री नंदी ने बजट को “कॉर्पोरेट-मुखी” करार देते हुए कहा कि यह आम नागरिकों की आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि सरकार बड़े कॉर्पोरेट घरानों पर अतिरिक्त कर लगाती, तो उससे प्राप्त संसाधनों का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन में किया जा सकता था। लेकिन सरकार उस दिशा में आगे बढ़ने को तैयार नहीं दिख रही है।
अंत में उन्होंने कहा कि प्रस्तुत बजट देश की जनता की वास्तविक समस्याओं – बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य – का समाधान करने में विफल रहा है और यह आर्थिक असमानता को और बढ़ाने वाला साबित होगा।





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