होमआसपास-प्रदेशछत्तीसगढ़: सरकारी स्कूलों में धार्मिक मंत्रोच्चार पर रोक की याचिका हाईकोर्ट ने...

छत्तीसगढ़: सरकारी स्कूलों में धार्मिक मंत्रोच्चार पर रोक की याचिका हाईकोर्ट ने खारिज की

बिलासपुर (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने सरकारी विद्यालयों में प्रार्थना सभा के दौरान हिंदू मंत्रों के उच्चारण पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका (Public Interest Litigation) खारिज कर दी है। 10 जुलाई 2026 को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा कि प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर न्यायालय के हस्तक्षेप का पर्याप्त औचित्य नहीं बनता। इसके साथ ही यह मामला न्यायिक स्तर पर फिलहाल समाप्त हो गया, हालांकि इस फैसले ने सरकारी विद्यालयों में धार्मिक गतिविधियों और संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना को लेकर बहस को फिर चर्चा में ला दिया है।

याचिका में दावा किया गया था कि राज्य के कुछ सरकारी विद्यालयों में प्रार्थना सभा के दौरान हिंदू धार्मिक मंत्रों का उच्चारण कराया जाता है। याचिकाकर्ता का कहना था कि सरकारी विद्यालय संविधान के अनुसार धर्मनिरपेक्ष सार्वजनिक संस्थान हैं और वहां किसी एक धर्म विशेष से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान या मंत्रों का अनिवार्य रूप से आयोजन सभी विद्यार्थियों के समान अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर न्यायालय से ऐसे मंत्रोच्चार पर रोक लगाने और राज्य सरकार को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई थी।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने उपलब्ध दस्तावेजों और दोनों पक्षों के तर्कों पर विचार किया। अंततः खंडपीठ ने माना कि याचिका में ऐसे पर्याप्त तथ्य प्रस्तुत नहीं किए गए हैं जिनके आधार पर न्यायालय इस मामले में हस्तक्षेप करे। इसी कारण जनहित याचिका को खारिज कर दिया गया।

फैसले के बाद जारी प्रेस विज्ञप्ति में कुछ नागरिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने निराशा व्यक्त की है। उनका कहना है कि सरकारी विद्यालयों का वातावरण ऐसा होना चाहिए, जहां सभी धर्मों और समुदायों के विद्यार्थी समान सहजता के साथ शिक्षा प्राप्त कर सकें। उनके अनुसार विद्यालयों में किसी एक धार्मिक परंपरा से जुड़े मंत्रों का अनिवार्य प्रयोग संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना पर प्रश्न खड़े कर सकता है।

संगठनों का कहना है, “हम किसी धर्म या धार्मिक आस्था के विरोधी नहीं हैं। हमारी मांग केवल इतनी है कि सरकारी विद्यालय संविधान की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के अनुरूप संचालित हों और सभी विद्यार्थियों के अधिकार समान रूप से सुरक्षित रहें।”

संविधान का क्या कहना है?
यह विवाद मुख्य रूप से संविधान के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों से जुड़ा हुआ है।

अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है।

अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार की व्यापक व्याख्या करता है।

अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आस्था मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।

अनुच्छेद 28 राज्य द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा के संबंध में विशेष प्रावधान करता है।

अनुच्छेद 51(क) नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा सुधार की भावना विकसित करने की बात कही गई है।

हालांकि, किसी भी न्यायिक निर्णय की तरह इस मामले में भी अदालत ने उपलब्ध तथ्यों और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर ही अपना निर्णय दिया है। इसलिए इस आदेश को व्यापक संवैधानिक व्याख्या के बजाय इस विशेष याचिका के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

यह बहस क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत जैसे बहुधार्मिक समाज में सरकारी विद्यालय केवल शिक्षा के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक समावेशन के भी महत्वपूर्ण संस्थान हैं। एक पक्ष का मानना है कि धर्म परंपराओं से जुड़े प्रार्थना गीत या मंत्र नैतिक शिक्षा और भारतीय सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। वहीं दूसरा पक्ष तर्क देता है कि राज्य संचालित विद्यालयों को किसी विशेष धार्मिक पहचान से दूरी बनाए रखनी चाहिए ताकि सभी विद्यार्थियों में समानता और निष्पक्षता का विश्वास बना रहे।
यही कारण है कि यह विवाद केवल एक प्रार्थना तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था, धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य की धर्मनिरपेक्ष भूमिका जैसे व्यापक संवैधानिक प्रश्नों से जुड़ा हुआ माना जा रहा है।

अब आगे क्या?
प्रेस विज्ञप्ति में संकेत दिया गया है कि संबंधित संगठन उपलब्ध कानूनी विकल्पों पर विचार कर सकते हैं। यदि वे उच्चतम न्यायालय (Supreme Cour) का दरवाजा खटखटाते हैं, तो इस विषय पर आगे न्यायिक समीक्षा की संभावना बन सकती है। हालांकि, फिलहाल छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का आदेश प्रभावी रहेगा।

आम लोगों पर क्या असर?
इस फैसले का सीधा प्रभाव राज्य के सरकारी विद्यालयों, विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षा विभाग पर पड़ सकता है। साथ ही यह निर्णय एक बार फिर इस प्रश्न को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में लाता है कि सरकारी शिक्षण संस्थानों में धार्मिक परंपराओं और संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए। यही बहस आने वाले समय में शिक्षा नीति और न्यायिक विमर्श दोनों को प्रभावित कर सकती है।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments